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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-215

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार, सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ।। भावार्थ:- हे तात! मैं चरण पकड़ कर आप से भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ), कि आप मेरा दुलार...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-214

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तव उर कुमति बसी बिपरीता, हित अनहित मानहु रिपु प्रीता, कालराति निसिचर कुल केरी, तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ।। भावार्थ:- आप के हृदय में उल्टी बुद्धि आ बसी है । इसी से आप हित...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-213

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुमति कुमति सब कें उर रहही, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ।। भावार्थ:- हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि)...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-212

जय श्री राधे कृष्ण ….. "रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ, दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ, माल्यवंत गृह गयउ बहोरी, कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ।। भावार्थ:- (रावण ने कहा), ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं ।...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-211

जय श्री राधे कृष्ण ….. "माल्यवंत अति सचिव सयाना, तासु बचन सुनि अति सुख माना, तात अनुज तव नीति बिभूषन, सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ।। भावार्थ:- माल्यवान नाम का एक बहुत ही बुध्दिमान मंत्री था । उसने उन...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-210

जय श्री राधे कृष्ण ….. "बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस, परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ।। भावार्थ:- हे दशशीश! मैं बार - बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-209

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा, जासु नाम त्रय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ।। भावार्थ:- जिसे सम्पूर्ण जगत से द्रोह करने का पाप लगा है,...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-208

जय श्री राधे कृष्ण ……. "ताहि बयरु तजि नाइअ माथा, प्रनतारति भंजन रघुनाथा, देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही, भजहु राम बिनु हेतु सनेही ।। भावार्थ:- वैर त्याग कर उन्हें मस्तक नवाइए । वे श्री रघुनाथ जी शरणागत का दु:ख नाश...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-207

जय श्री राधे कृष्ण ……. " गो द्विज धेनु देव हितकारी, कृपा सिंधु मानुष तनुधारी, जन रंजन भंजन खल ब्राता, बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ।। भावार्थ :- उन कृपा के समुद्र भगवान ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-206

जय श्री राधे कृष्ण ……. " तात राम नहिं नर भूपाला, भुवनेस्वर कालहु कर काला, ब्रह्म अनामय अज भगवंता, ब्यापक अजित अनादि अनंता ।। भावार्थ:- हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं, वे समस्त लोकों के स्वामी और...

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