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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-254

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अस सज्जन मम उर बस कैसें, लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें, तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें, धरउँ देह नहिं आन निहोरें ।। भावार्थ:- ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-253

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सब कै ममता ताग बटोरी, मम पद मनहि बांध बरि डोरी, समदरसी इच्छा कछु नाहीं, हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।। भावार्थ:- इन सब के ममत्व रुपी तागों को बटोर कर और उन सब...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-252

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तजि मद मोह कपट छल नाना, करउँ सद्य तेहि साधु समाना, जननी जनक बंधु सुत दारा, तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ।। भावार्थ:- और मद, मोह तथा नाना प्रकार के छल कपट त्याग दे तो...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-251

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ, जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ, जौं नर होइ चराचर द्रोही, आवै सभय सरन तकि मोही ।। भावार्थ:- (श्री राम जी ने कहा) हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ,...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज, देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज ।। भावार्थ:- हे कृपा और सुख के पुंज श्री राम जी! मेरा अत्यंत असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा...

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सुविचार

जय श्री राधे कृष्ण ….. "मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ, सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ, जासु रुप मुनि ध्यान न आवा, तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ।। भावार्थ:- मैं अत्यंत नीच स्वभाव का राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण...

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सुविचार

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अब मैं कुसल मिटे भय भारे, देखि राम पद कमल तुम्हारे, तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला, ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूल ।। भावार्थ:- हे श्री राम जी! आपके चरण विंद के दर्शन कर अब...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-249

जय श्री राधे कृष्ण ….. "ममता तरुन तमी अँधिआरी, राग द्वेष उलूक सुखकारी, तब लगि बसति जीव मन माहीं, जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ।। भावार्थ:- ममता पूर्ण अंधेरी रात है, जो राग -द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देने...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-248

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तब लगि हृदयँ बसत खल नाना, लोभ मोह मच्छर मद माना, जब लगि उर न बसत रघुनाथा, धरें चाप सायक कटि भाथा ।। भावार्थ:- लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-247

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम, जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ।। भावार्थ:- तब तक जीव की कुशल नहीं और ना स्वप्न में भी उस के मन...

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