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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-262

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना, ते नर पसु बिनु पूंछ बिषाना, निज जन जानि ताहि अपनावा, प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ।। भावार्थ:- ऐसे परम कृपालु प्रभु को छोड़ कर जो मनुष्य दूसरे...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-261

जय श्री राधे कृष्ण ….. "रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड, जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड ।। भावार्थ:- श्री राम जी ने रावण के क्रोध रूपी अग्नि में जो अपनी (बिभीषण की) श्वास (वचन) रूपी पवन से प्रचंड...

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बेटा

बेटा नवविवाहिता पत्नी बार-बार अपनी सास पर आरोप लगाए जा रही थी और उसका पति बार-बार उसको अपनी हद में रहकर बोलने की बात कह रहा था। पत्नी थी कि चुप होने का नाम ही नही ले रही थी। जितनी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-260

जय श्री राधे कृष्ण ….. "जदपि सखा तव इच्छा नाहीं, मोर दरसु अमोघ जग माहीं, अस कहि राम तिलक तेहि सारा, सुमन बृष्टि नभ भई अपारा ।। भावार्थ:- (और कहा) हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगत में...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-259

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अब कृपाल निज भगति पावनी, देहु सदा सिव मन भावनी, एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा, मागा तुरत सिंधु कर नीरा ।। भावार्थ:- अब तो हे कृपालु! शिव जी के मन को सदैव प्रिय लगने वाली अपनी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-258

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुनहु देव सचराचर स्वामी, प्रनतपाल उर अंतरजामी, उर कछु प्रथम बासना रही, प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ।। भावार्थ:- (विभीषण जी ने कहा) हे देव! हे चराचर जगत के स्वामी ! हे शरणागत के...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-256

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुनु लंकेस सकल गुन तोरें, तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें, राम बचन सुनि बानर जूथा, सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ।। भावार्थ:- हे लंकापति ! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं। इससे तुम मुझे...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-255

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम, ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ।। भावार्थ:- जो सगुण (साकार) भगवान के उपासक हैं, दूसरे के हित में लगे रहते हैं, नीति और...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-254

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अस सज्जन मम उर बस कैसें, लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें, तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें, धरउँ देह नहिं आन निहोरें ।। भावार्थ:- ऐसा सज्जन मेरे हृदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय...

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