परमसत्ता की अनुकम्पा– कृपानुभूति
बात उन दिनों की है, जब मुझे इस संसारमें आये हुए कुछ दिवस ही हुए थे, उस समय मैं माता-पिता तथा परिवारजनों की गोद का खिलौना ही था। तभी मैं एका एक निमोनिया से गम्भीर बीमार हो गया। उस समय के हकीम और डॉक्टरों से इलाज कराया गया, लेकिन उपचार का कोई प्रभाव नहीं हो रहा था। मेरे ठीक होने की एक भी आशाको किरण दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी। मुझसे पूर्व मेरी तीन बहिनें बाल्यावस्था में कालका कलेवा हो चुकी थीं। एक दिन मेरी साँसें मद्धिम पड़ने लगीं तो मेरे माता-पिता सहित सभी परिवारीजनों के मन में भावों का ज्वार उमड़ने लगा और वे सोचने लगे कि मेरी तीनों बहिनों की तरह इसकी जीवन-लीला भी समाप्त होने वाली है। परिवारीजन और ग्रामवासी भी दुखी थे।
चूँकि मेरी साँसें मद्धिम हो चुकी थीं, इसलिये मेरे ताऊजी, जिन्हें हम बड़े दाऊ कहते थे, ने फावड़ा भी मँगाकर रख लिया और मेरी साँसें रुकने का इन्तजार करने लगे। काफी भीड़ जमा हो चुकी थी, सभी संवेदनाएँ मेरे परिवार के साथ थीं, पर वे सभी विवश थे। उस समय सभी लोग मेरी साँसें रुकने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि साँस थमने पर नदी में ले जाकर धरती माता की गोद में सुला आयें और सभी अपने-अपने कार्यों पर जायें।
लेकिन ब्रह्माण्ड की परमसत्ता के स्वामी श्रीहरि ने कुछ और ही रच रखा था। उसी समय एक साधारण-सी परंतु आश्चर्यजनक घटना हुई, मेरे गाँव मऊसे करीब 5 किमी दूर ग्राम कसीसों-निवासी ज्योतिषाचार्य पण्डित श्यामलालजी, जो मेरे परिवार के सभी धार्मिक कार्योंको सम्पादित करते थे, एक अन्य महानुभाव के साथ घर पर आ पहुँचे। मुझे माता-पिता, ताऊजी, दादाजी तथा अन्य परिवारीजनों द्वारा बताया गया कि पण्डितजी तथा साथ आये अपरिचित महानुभाव के द्वारा घरके मुख्य द्वार से अन्दर प्रवेश करते ही मेरे अचेतन शरीर में कुछ स्पन्दन हुए, सभी आश्चर्यजनक दृष्टिसे मुझे देखने लगे और ईश्वरसे प्रार्थना भी करने लगे, पण्डितजी के पूछने पर सम्पूर्ण हाल बताया गया।
पण्डितजी के साथ आये महानुभाव मेरे पास आकर खड़े हुए और अपने हाथ से मुझे स्पर्श किया। उन्होंने उसी समय कहा कि कोई चिन्ता न करें, बच्चा ठीक हो जायगा। उन्होंने एक पुड़िया दवा दी और मुझे पिलाने को कहा। पण्डितजी और वे महानुभाव काफी अनुनय-विनय करनेके बाद भी नहीं रुके और घरसे शीघ्र ही प्रस्थान कर गये और मैं धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया। परिवारीजनों ने बताया कि उन्होंने इस घटनाके सम्बन्ध में कभी पण्डितजी से उनके साथ आये, उन महानुभाव के बारे में नहीं पूछा, न पूछनेका मनमें विचार ही आया कि वे कौन थे ? पण्डितजी ने भी इस पर कभी चर्चा नहीं की इस घटनाका यह अद्भुत और आश्चर्यपूर्ण पक्ष रहा। मैं तो यही मानता हूँ कि वे महानुभाव और कोई नहीं, बल्कि स्वयं परमात्म प्रभु ही थे, उन्होंने मुझे तो जीवनदान दिया, पर सबकी बुद्धिपर मायाका आवरण डाले रखा कि कोई जान न सके।
श्रीहरि की कृपा से मैं अनेक घटनाओं में सुरक्षित रहा। बचपन से ही मेरी धार्मिक ग्रन्थों, कथाओं को पढ़ने, श्रवण करने में रुचि बढ़ती रही। मैं अपने दादाजी-दादीजी, माता-पिता, बुआजी की खूब सेवा करता था। उनका आशीर्वाद सदा मेरे साथ है, पण्डित श्यामलालजी मुझसे विशेष स्नेह करते थे।
अन्तमें मैं यही कहना चाहूँगा कि सृष्टि के रचयिता की परमसत्ता का कोई पारावार नहीं है, चराचर जगत् के सभी प्राणियों के द्वारा किये जाने वाले कार्यों को उन्होंने पूर्व में ही निश्चित किया हुआ है, उसी का यह परिणाम है कि मेरी जीवन-लीला, जो बाल्यकालमें ही समाप्त होनेवाली थी, आज भी उनकी कृपा की छाया में सुरक्षित है और आज परमपिता परमेश्वरकी असीम अनुकम्पा से उसी बालक के द्वारा विभिन्न रूपोंमें उनकी सेवा हो रही है। उस परमसत्ताके स्वामी योगयोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के चरणारविन्दमें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कोटिशः नमन।
[ श्रीयुत डॉ० श्रीरामवीर सिंहजी ‘वीर’]
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जय श्रीराम