सुविचार-सुन्दरकाण्ड-11
जय श्री राधे कृष्ण ……. बदन पइठि पुनि बाहेर आवा, मागा बिदा ताहि सिरु नावा, मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा, बुधि बल मरमु तोर मैं पावा…!! भावार्थ:- और वे उसके मुख में घुसकर (तुरंत) फिर बाहर निकल आए और उसे...
जय श्री राधे कृष्ण ……. बदन पइठि पुनि बाहेर आवा, मागा बिदा ताहि सिरु नावा, मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा, बुधि बल मरमु तोर मैं पावा…!! भावार्थ:- और वे उसके मुख में घुसकर (तुरंत) फिर बाहर निकल आए और उसे...
जय श्री राधे कृष्ण ……. जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा, तासु दून कपि रूप देखावा, सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा, अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा…..!! भावार्थ:- जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान जी उसका दूना रूप दिखलाते थे...
जय श्री राधे कृष्ण ……. जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा,/कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा, सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ, तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ….!! भावार्थ:- उसने योजन भर (चार कोस में) मुंह फैलाया । तब हनुमान जी ने अपने शरीर को...
जय श्री राधे कृष्ण ……. तब तव बदन पैठिहउं आई, सत्य कहउँ मोहि जान दे माई, कवनेहुं जतन देइ नहिं जाना, ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना…!! भावार्थ:- तब मैं आकर तुम्हारे मुंह में घुस जाऊंगा (तुम मुझे खा लेना) हे...
जय श्री राधे कृष्ण ……. आजु सुरन्ह मोहि दीन अहारा, सुनत बचन कह पवनकुमारा, राम काजु करि फिरि मैं आवौं, सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं….. !! भावार्थ:- आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवन कुमार हनुमान...
जय श्री राधे कृष्ण ……. जात पवनसुत देवन्ह देखा, जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा, सुरसा नाम अहिन्ह कै माता, पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता…..!! भावार्थ:- देवताओं ने पवन पुत्र हनुमान जी को जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल - बुद्धि...
जय श्री राधे कृष्ण …….. " हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम , राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम…!! भावार्थ:- हनुमान जी ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा - भाई! श्री रामचंद्र जी का...
जय श्री राधे कृष्ण …….. " ख़ुद पर भरोसा करना परिंदों से सीखना चाहिए, जब वो शाम को वापस, घोंसलों में जाते हैं तो, उनकी चोंच में कल के लिए दाना नहीं होता हैं….!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता से...
जय श्री राधे कृष्ण …….. " जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता , चलेउ सो गा पाताल तुरंता , जिमि अमोघ रघुपति कर बाना एही भांति चलेउ हनुमाना……!! भावार्थ:- जिस पर्वत पर हनुमान जी पैर रखकर चले (जिस पर से वह...
जय श्री राधे कृष्ण …….. " सिंधु तीर एक भूधर सुन्दर, कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर, बार बार रघुबीर संभारी, तरकेउ पवनतनय बल भारी……!! भावार्थ:- समुद्र के तीर पर एक सुंदर पर्वत था। हनुमान जी खेल से ही (अनायास ही)...