आधी रोटी
एक बार श्रावस्ती में भयंकर अकाल पड़ा। अनेकों लोग भूख से मर गए। सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति उन माताओं की थी जिनकी गोद में छोटे-छोटे बच्चे थे, उनके घर के पुरुष भूख से मर चुके थे।
भगवान बुद्ध से यह देखा नहीं गया। उन्होंने लोगों की गोष्ठी बुलाई और कहा, “आप लोग इन असहाय माताओं और बच्चों की रक्षा करो।”
गोष्ठी में धनवान लोग भी थे। वे बोले, “हमारे पास अनाज है, किंतु वह हमारे परिवार के लिए केवल एक वर्ष के लिए है। हम इसमें से किसी को कैसे दे सकते हैं?” सब सिर झुकाकर बैठे थे।
तभी बारह वर्ष की एक कन्या सुचेता ने कहा, “देव, मुझे आज्ञा दीजिए, यह काम मैं करूंगी ?”
कन्या ने कहा, “मनुष्य कितना भी निष्ठुर हो, उसके हृदय में कहीं न कहीं करुणा छिपी रहती है। मैं उनकी करुणा जगाऊंगी। जिनके घर चूल्हा जलेगा, मैं उनके घर जाऊंगी और मरणासन्न बच्चों के लिए आधी रोटी मांगूंगी।”
बुद्ध ने उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, “तुम जनभावना की दृष्टि से धनवानों से भी अधिक संपन्न हो। तुम्हें अपने काम में सफलता मिलेगी।”
सुचेता का व्रत एक वर्ष तक चला। उसने इस अवधि में प्रतिदिन लगभग एक हजार अनाश्रित लोगों को भोजन कराया।
जय श्रीराम