कृपानुभूति
श्रीहनुमान्जी की कृपासे असम्भव भी सम्भव हो गया
वर्ष 1984 समस्त देशके लिये अत्यन्त चुनौतीपूर्ण वर्ष था। अमृतसर में अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में सेनाको 6 जून 1984 ई० को ऑपरेशन ब्लू स्टार करना पड़ा, जिसके अत्यन्त दूरगामी परिणाम आये।
सिख पलटन देश की बड़ी बहादुर एवं सम्मानित रेजीमेण्ट है, जिसे सर्वाधिक अलंकरण प्राप्त हुए हैं, जैसे 14 विक्टोरिया क्रॉस, 2 परमवीर चक्र (सूबेदार करम सिंह और सूबेदार जोगेन्दर सिंह), 14 महावीर चक्र और ६८ वीरचक्र आदि। परंतु अपने शौर्य, पराक्रम एवं देशप्रेमके लिये विख्यात सिख रेजीमेण्ट के लगभग तीन हजार सैनिकों ने दुर्भाग्य से देश के विभिन्न भागों में बगावत कर दी।
12 जून 1984 को बिहारके रामगढ़ के सिख रेजिमेण्टल सेन्टर (जिसकी स्थापना 1976 में हुई थी) में भी यही दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, जहाँ पर युवा रंगरूटों ने अपने वरिष्ठ अधिकारी ब्रिगेडियर एस०सी० पुरी और उनके ड्राइवर की हत्या कर दी तथा पूरा-का-पूरा शस्त्रागार लूट लिया और सैकड़ों स्वचालित हथियार तथा हजारों कारतूस लूटकर रामगढ़ शहर में आये और तीन ट्रकों को भी लूटकर पश्चिम की तरफ कूच किया।
इन गुमराह रंगरूटों एवं इनका नेतृत्व करनेवाले कुछ अधिकारियों को कोई आभास नहीं था कि उन्होंने क्या कर दिया!
क्योंकि समूह पूरी तरह से अस्त्र-शस्त्रसे लैस था, युवा एवं भलीभाँति प्रशिक्षित था, कई स्थानों पर सेनाने इन्हें रोकने का प्रयास किया एवं लाइट मशीनगन, मीडियम मशीनगन तथा अन्य उच्चकोटि के हथियार प्रयोग में लाये गये, पर वह उन्हें रोकने में असफल रही। यह समूह पूरा बिहार पार करके पूर्वी उत्तर प्रदेश पार करते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरफ आ चुका था।
उस समय मैं जनपद एटा में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त था। समस्त परिस्थितियों का आकलन करने के उपरान्त प्रदेश शासन ने स्पष्ट निर्देश दिये कि पुलिस के पास इतने उच्च कोटिके अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं। अतः पुलिस को इन्हें रोकने का प्रयास नहीं करना है, यह कार्य केवल फौज द्वारा अपने कमाण्डोज तथा उत्कृष्ट हथियारों की सहायता से ही सम्पादित किया जायगा।
यह सूचना एटा जनपद मुख्यालय को प्राप्त हुई कि यह सशस्त्र समूह एटाकी तरफ आ रहा है। यद्यपि सेना पहले से ही कई स्थानों पर इन्हें रोकने का प्रयास कर रही थी, किंतु सैन्य बलकी कमी के कारण कदाचित् जनपद एटा में सेना द्वारा इनको रोक पाने की सम्भावना लगभग असम्भव प्रतीत हो रही थी। यह भी सम्भावना थी कि यह समूह अगर एटा की सीमा पार कर गया तो दिल्ली जाकर घोर हिंसा कर सकता है।
इस चुनौतीपूर्ण परिस्थितिमें जब कोई रास्ता नहीं दिखायी पड़ा, तो मैंने तत्काल श्रीहनुमान्जी का स्मरण किया और कुछ पंक्तियाँ श्रीहनुमानचालीसा की अकस्मात् मानस पटलपर बार-बार निरन्तरता के साथ आने लगीं।
बुद्धिहीन तनु जानि के, सुमिरौं पवन कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥
बस, फिर क्या था! शरीर में एक अद्भुत ऊर्जा, शक्ति एवं साहस का संचार होने लगा! मैंने पुलिस लाइन जाकर घोषणा की कि एक अत्यन्त विषम एवं चुनौतीपूर्ण परिस्थिति है। पूरे खतरे से सभी को अवगत कराया और कहा कि जो जवान स्वेच्छा से चलना चाहें उनका स्वागत है, जो न चलना चाहें उनकी कोई आलोचना, निन्दा नहीं है।
अत्यन्त हर्ष का विषय था कि कुछ जवान तत्काल तैयार हुए और तुरंत हम जनपद मैनपुरी-एटा सीमा को तरफ चल दिये। यद्यपि हमारी संख्या बहुत कम थी, लेकिन श्रीहनुमान्जी की साक्षात् कृपा से एक अद्भुत व्यूह-रचनाकी प्रेरणा प्रसादरूप में प्राप्त हुई। उपलब्ध सीमित संसाधनों से मार्गपर बैरियर लगाये गये एवं सुरक्षित पोजीशन ली गयी। उल्लेखनीय है कि विद्रोहियों के मुकाबले पुलिसके पास पुराने युगके हथियार थे, जैसे 303 राइफलें, जबकि उनके पास अत्याधुनिक एवं स्वचालित हथियार थे।
इस समूह के पास आने पर लाउडस्पीकर से घोषणा की गयी कि आप चारों तरफ से घिर गये हैं, चारों तरफ पुलिस बल, अर्धसैनिक बलोंने मोर्चा सँभाल लिया है, आत्मसमर्पण कर दें, अन्यथा इसके गम्भीर परिणाम होंगे। विद्रोहियों के ट्रकों को सूझबूझ एवं आक्रामक फायरिंग से पंचर कर दिया गया। यद्यपि घटनास्थल पर अर्धसैनिक बल या सशस्त्र पुलिस बल की कोई बड़ी टुकड़ी नहीं थी, पर हनुमत्-कृपा से उनमें यह भ्रम उत्पन्न हो गया कि वे चारों तरफ से बड़े सैन्य बलसे घिर चुके हैं।
श्रीहनुमान्जी की ऐसी कृपा रही कि सभी विद्रोहियों ने चमत्कारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया और उत्तर प्रदेश पुलिस को एक अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। सेनाके वरिष्ठ अधिकारी हेलीकॉप्टर से आये तथा पूरी परिस्थिति का मूल्यांकन किया और पुलिस बलको बधाई देते हुए भूरि-भूरि प्रशंसा की।
पुलिस उप महानिरीक्षक आगरा श्रीप्रकाश सिंहजी भी आये, पत्रकार वार्ताको सम्बोधित किया और शासन को वहींसे एक पत्र लिखा कि उत्तर प्रदेश पुलिस के लिये यह सफलता अभूतपूर्व है। इसके पहले इतनी भारी मात्रामें स्वचालित हथियार और हजारों कारतूस प्रदेश पुलिस द्वारा कभी भी बरामद नहीं किये गये थे।
सभी विद्रोहियों को गिरफ्तार कर पुलिस लाइन लाया गया, उन सभी के स्नान, जलपान एवं भोजन की तुरंत व्यवस्था करवायी गयी।
पूरी स्थिति की जब शान्ति से समीक्षा की गयी तो यह स्पष्ट हुआ कि श्रीहनुमान्जी ने हम सभी को निश्चित मृत्यु के मुँहसे न केवल सकुशल निकाला, अपितु सत्य एवं राष्ट्रहित को विजय दिलायी। मुझे कोई सन्देष्ठ नहीं है कि मुझ में ऐसी कोई प्रतिभा न तब थी न आज है,
यह केवल श्रीहनुमान्ीकी कृपा एवं आशीर्वाद का चमत्कार था कि इस चुनौती का सफल समाधान हुआ।
यही नहीं, मुझ अकिंचन को भी, इस मुठभेड़ हेतु पुलिस का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अलंकरण, राष्ट्रपतिका शौर्य पदक प्रदान किया गया, जिसके लिये मैं अपने को सर्वथा अनुपयुक्त मानता हूँ। इस अलंकरण को मैं भक्ति एवं दास्यभाव से श्रीहनुमान्जी के श्रीचरणोंमें अर्पित करता हूँ। डॉ० श्रीविक्रम सिंहजी ]
कल्याण गौरखपुर
जय श्रीराम
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