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लोकमंगल की अयोध्या-    लोकतंत्रीय पुरुषोत्तम

लोकमंगल की अयोध्या-    लोकतंत्रीय पुरुषोत्तम वाल्मीकि रामायण में मारीच कहता है:- "रामो विग्रहवान् धर्मः।" यानि राम धर्म के अवतार हैं। इस 'रामधर्म' में राजधर्म, मनुष्य धर्म, युद्ध धर्म की परिभाषा भी अंतर्निहित है। अयोध्या सत्ता के शिखर का प्रतीक थी।...

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विश्वास- श्री राम कथा से

श्री राम कथा से सुन्दर स्त्री बाद में शूर्पणखा निकली। सोने का हिरन बाद में मारीच निकला। भिक्षा माँगने वाला साधू बाद में रावण निकला। लंका में तो निशाचार लगातार रूप ही बदलते दिखते थे। हर जगह भ्रम, हर जगह...

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अयोध्या

अयोध्याहम सभी जानते हैं कि वैवस्वत मनु महाराज द्वारा सरयू तट पर अयोध्या की स्थापना की गई थी। उसी अयोध्या में त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम का अवतरण (जन्म) हुआ था।…अयोध्या पर हमला करने वाला पहले आक्रांता ग्रीक मिनिएंडर था, जिसे...

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भगवान श्री राम की प्राण – प्रतिष्ठा

भगवान श्री राम की प्राण - प्रतिष्ठाभगवान श्री राम लला…. लगभग पांच सौ वर्ष के पश्चात… अपनी जन्म स्थली अवधपुरी में विराजमान हो गए हैं। क्या है प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया…..? आईए जानते हैं।मूर्तिकार की कल्पना…..उंगलियों की जादूगरी…..छेनी की हजारों...

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पौष माह की ऐतिहासिक दीपावली…

पौष माह की ऐतिहासिक दीपावली... मन की गति से उड़ता पुष्पक विमान.... जब अवधपुरी के दर्शनयोग्य... क्षितिज पर पहुंच गया.... तो विह्नल..., अधीर... राम उन दर्शनो को नेत्रस्थ करके.... जैसे बालसम हो गए...., उछल पड़े...! आ गई अवधपुरी...., ओह्ह....! मेरा...

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राम’ नाम का रहस्य

राम’ नाम का रहस्य 'राम‘ सिर्फ एक नाम नहीं। राम मात्र दो अक्षर नहीं। राम हमारी सांस्कृतिक विरासत है। राम हमारी की एकता और अखंडता हैं। राम हमारी आस्था और अस्मिता के सर्वोत्तम प्रतीक हैं। राम सनातन धर्म की पहचान...

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लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा – एक अनजाने सत्य से परिचय

लक्ष्मण जी के त्याग की अदभुत कथा - एक अनजाने सत्य से परिचय -हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा  संसार  में भर  में  गाई जाती है। लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी. लक्ष्मणजी  की  कथा  के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं...

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कैसे आते हैं श्रीराम

कैसे आते हैं श्रीराम उस घने वन में एक ओर सीधे सादे भीलों की बस्तियां होतीं थीं, तो दूसरी ओर तपस्वी ऋषियों के आश्रम! प्रकृति द्वारा निर्मित व्यवस्था के अनुसार जीवन यापन करने वाले ये मानव चुपचाप अपनी परम्पराओं के...

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फिर चौदह वर्ष बाद

फिर चौदह वर्ष बाद गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज, नमत जिनहिं सुर मुनि संकर अज।( श्रीरामचरितमानस ), मित्र ! क्षमा करें मैं अब अयोध्या के लिए प्रस्थान करना चाहता हूँ । श्रीराम ने जब विभीषण से ये कहा, तब...

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मै यहीं रहूँगा- गिरिराज और गोवर्धन

मै यहीं रहूँगा- गिरिराज और गोवर्धन समुद्र पार जाने के लिए पुल के निर्माण का काम प्रगति पर था । राम की सेना उत्साह से फूली नहीं समा रही थी । भालू-वानर भाग-भागकर काम कर रहे थे । तभी एकाएक...

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