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सुविचार

जय श्री राधे कृष्ण ……. "मेंढक को सोने की कुर्सी पर भी बैठा देंगे फिर भी वो छलांग लगा कर दोबारा कीचड़ में ही जायेगा, जिंदगी में कुछ लोग इसी तरह के होते हैं….!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता से...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-73

जय श्री राधे कृष्ण ……. "राम दूत मैं मातु जानकी, सत्य सपथ करुणानिधान की, यह मुद्रिका मातु मैं आनी, दीन्हि राम तुम्ह कहं सहिदानी….!! भावार्थ:- (हनुमान जी ने कहा) हे माता जानकी ! मैं श्री राम जी का दूत हूंँ...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-72

जय श्री राधे कृष्ण ……. "श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई, कही सो प्रगट होति किन भाई, तब हनुमंत निकट चलि गयऊ, फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ….!! भावार्थ:- (सीता जी बोलीं-) जिस ने कानों के लिए अमृत रूप यह सुंदर कथा कही...

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सुविचार

जय श्री राधे कृष्ण ……. " जीवन मे धन आते ही सुख मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं किन्तु धर्म आते ही जीवन सुखमय बनेगा इसमें कोई संदेह नहीं। आज से हम सदा धर्म पर चलें…..!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-71

जय श्री राधे कृष्ण ……. "रामचंन्द्र गुन बरनैं लागा, सुनतहिं सीता कर दुख भागा, लागीं सुनैं श्रवन मन लाई आदिहु तें सब कथा सुनाई….!! भावार्थ:- वे श्री रामचंद्र जी के गुणों का वर्णन करने लगे (जिनके) सुनते ही सीता जी...

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सुविचार

जय श्री राधे कृष्ण ……. "कोई भी परेशानी वास्तव में उतनी बड़ी नहीं होती जितनी हम उसे बार- बार सोचकर बना देते हैं…!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो.....

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-70

जय श्री राधे कृष्ण ……. "जीति को सकइ अजय रघुराई, माया ते असि रचि नहिं जाई, सीता मन बिचार कर नाना, मधुर बचन बोलेउ हनुमाना l…..!! भावार्थ:- श्री रघुनाथ जी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है ?...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-69

जय श्री राधे कृष्ण ……. "तब देखी मुद्रिका मनोहर, राम नाम अंकित अति सुंदर, चकित चितव मुदरी पहिचानी, हरष बिसाद हृदयँ अकुलानी…..!! भावार्थ:- तब उन्होंने राम - नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर अंगूठी देखी । अंगूठी को पहचान...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-68

जय श्री राधे कृष्ण ……. "कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब, जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ…..!! भावार्थ:- तब हनुमान जी ने हृदय में विचार कर (सीता जी के सामने) अंगूठी डाल दी, मानो अशोक ने...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-67

जय श्री राधे कृष्ण ……. "नूतन किसलय अनल समाना, देहि अगिनि जनि करहि निदाना, देखि परम बिरहाकुल सीता, सो छन कपिहि कलप सम बीता….!! भावार्थ:- तेरे नए-नए कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोग का अन्त मत कर...

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