सुविचार
जय श्री राधे कृष्ण ……. "अच्छे कर्म भी करने पड़ते है साहब सिर्फ पूजा करने से भगवान नही मिलते। जब कर्म है काला तो क्या करेगी माला….!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो.....
जय श्री राधे कृष्ण ……. "अच्छे कर्म भी करने पड़ते है साहब सिर्फ पूजा करने से भगवान नही मिलते। जब कर्म है काला तो क्या करेगी माला….!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो.....
जय श्री राधे कृष्ण ……. "पावकमय ससि स्रवत न आगी, मानहुँ मोहि जानि हतभागी, सुनहि बिनय मम बिटप असोका, सत्य नाम करु हरु मम सोका….!! भावार्थ:- चंंद्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जान कर आग नहीं बरसाता।...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "अपनी स्वयं की क्षमता से कार्य करना चाहिए , अन्य लोगों की निर्भरता का त्याग तत्काल कर देना चाहिए….!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो.....
जय श्री राधे कृष्ण ……. "कह सीता बिधि भा प्रतिकूला, मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला, देखिअत प्रगट गगन अंगारा, अवनि न आवत एकउ तारा….!! भावार्थ:- सीता जी (मन ही मन) कहने लगीं - (क्या करूं) विधाता ही विपरीत हो...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "सुनत बचन पद गहि समुझाएसि, प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि, निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी, अस कहि सो निज भवन सिधारी…..!! भावार्थ:- सीता जी के वचन सुन कर त्रिजटा ने चरण पकड़ कर उन्हें...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "आनि काठ रचु चिता बनाई, मातु अनल पुनि देहि लगाई, सत्य करहि मम प्रीति सयानी, सुनै को श्रवन सूल सम वानी…..!! भावार्थ:- काठ लाकर चिता बना कर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच, मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच…..!! भावार्थ:- तब (इसके बाद) वे सब जहाँ तहाँ चलीं गईं । सीता जी मन में सोच करने लगीं कि...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "यह सपना मैं कहऊँ पुकारी, होइहि सत्य गएँ दिन चारी, तासु बचन सुनि ते सब डरीं, जनकसुता के चरनन्हिं परीं…!! भावार्थ:- मैं पुकार कर (निश्चय के साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही)...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई, लंका मनहुँ बिभीषन पाई, नगर फिरी रघुबीर दोहाई, तब प्रभु सीता बोलि पठाई……!! भावार्थ :- इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "सपनें बानर लंका जारी, जातुधान सेना सब मारी, खर आरूढ नगन दससीसा, मुंडित सिर खंडित भुज बीसा….!! भावार्थ:- मैंने स्वप्न देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी । राक्षसों की सारी सेना मार डाली...