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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-67

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जय श्री राधे कृष्ण …….

“नूतन किसलय अनल समाना, देहि अगिनि जनि करहि निदाना, देखि परम बिरहाकुल सीता, सो छन कपिहि कलप सम बीता….!!

भावार्थ:- तेरे नए-नए कोमल पत्ते अग्नि के समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोग का अन्त मत कर (अर्थात विरह-रोग को बढ़ा कर सीमा तक न पहुँचा)। सीता जी को विरह से परम व्याकुल देख कर वह क्षण हनुमान जी को कल्प के समान बीता…!!

सुप्रभात

आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो..

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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