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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-8

जय श्री राधे कृष्ण ……. तब तव बदन पैठिहउं आई, सत्य कहउँ मोहि जान दे माई, कवनेहुं जतन देइ नहिं जाना, ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना…!! भावार्थ:- तब मैं आकर तुम्हारे मुंह में घुस जाऊंगा (तुम मुझे खा लेना) हे...

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क्या हम कभी भगवान को धन्यवाद देने मंदिर गये है..

क्या हम कभी भगवान को धन्यवाद देने मंदिर गये है.. . एक अमीर आदमी था, उसने अपने गांव के सब गरीब लोगों के लिए और भिखारिओं के लिए माह-वारी (प्रतिमाह) दान बांध दिया था। किसी को दस रुपये मिलते महीने...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-7

जय श्री राधे कृष्ण ……. आजु सुरन्ह मोहि दीन अहारा, सुनत बचन कह पवनकुमारा, राम काजु करि फिरि मैं आवौं, सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं….. !! भावार्थ:- आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवन कुमार हनुमान...

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घर की मुखिया

घर की मुखिया घर के बाहर टैक्सी आकर रुकी थी। अनुराधा ने बाहर झांककर देखा तो मालती जी टैक्सी के बाहर निकल कर इंतजार कर रही थी कि घर में से कोई तो उन्हें लेने आए। लेकिन घर में बेटा...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-6

जय श्री राधे कृष्ण ……. जात पवनसुत देवन्ह देखा, जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा, सुरसा नाम अहिन्ह कै माता, पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता…..!! भावार्थ:- देवताओं ने पवन पुत्र हनुमान जी को जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल - बुद्धि...

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आईना

आईना दिवाली आने वाली थी। ऋचा घर के सभी कामों के साथ सफाई भी पूरी चुस्ती फुर्ती से कर रही थी। घर में उसके पति सास-ससुर,देवर-देवरानी,उसके दो बच्चे और एक देवर का बच्चा था। देवरानी नौकरी करती थी। इस तरह...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-5

जय श्री राधे कृष्ण …….. " हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम , राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम…!! भावार्थ:- हनुमान जी ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा - भाई! श्री रामचंद्र जी का...

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उपहास, विरोध और स्वीकृति

प्रत्येक महान कार्य को तीन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है- उपहास, विरोध और स्वीकृति। उपहास- मानव मन का एक स्वभाव यह भी है कि वह स्वयं कुछ श्रेष्ठ करना नहीं चाहता है और जो करना चाहता है उसे भी नहीं...

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सुविचार

जय श्री राधे कृष्ण …….. " ख़ुद पर भरोसा करना परिंदों से सीखना चाहिए, जब वो शाम को वापस, घोंसलों में जाते हैं तो, उनकी चोंच में कल के लिए दाना नहीं होता हैं….!! सुप्रभात आज का दिन प्रसन्नता से...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-4

जय श्री राधे कृष्ण …….. " जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता , चलेउ सो गा पाताल तुरंता , जिमि अमोघ रघुपति कर बाना एही भांति चलेउ हनुमाना……!! भावार्थ:- जिस पर्वत पर हनुमान जी पैर रखकर चले (जिस पर से वह...

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