जड़ से ही काट दो
एक संत घूमते घूमते एक छोटे से गांव में आए। वहां संत बड़े आश्चर्य में पड़ गए क्योंकि गांव में एक विचित्र सी गंध थी,और बीच कहीं से बड़ा धुआं उठ रहा था। जैसे जैसे संत आगे बढ़ते गए, गंध और धुआं भी बढ़ते चले गए।
बीच चौराहे पर पहुंच कर संत ने देखा कि बहुत से लोग वहां लगे असंख्य पत्तों वाले एक बहुत बड़े पेड़ पर चढ़े हुए थे और उस पेड़ के हरे पत्ते तोड़ तोड़ कर नीचे गिरा रहे थे। नीचे बहुत से लड़के झाड़ू मार कर उन गिरे हुए पत्तों को इकट्ठा कर रहे थे और कईं स्त्रियां उन पत्तों की बड़ी बढ़ी ढेरियां बनाकर आग लगा रही थीं।
संत ने एक आदमी को बुला कर सारा माजरा जानना चाहा।
उस आदमी ने बताया कि हमारे इस पेड़ के पत्ते बहुत दुर्गंध देते हैं। इतनी दुर्गंध कि हमारा जीना मुश्किल है। इसीलिए कईं पीढ़ियों से हम प्रतिदिन इस पेड़ के पत्ते तोड़ तोड़ कर जलाया करते हैं।
इस काम में हमारा आधा जीवन यूँ ही नष्ट हो रहा है। हम कोई अन्य विशेष काम भी नहीं कर पाते, बच्चे पढ़ नहीं पाते, स्त्रियां सुख से रह नहीं पाती।
इस पुश्तैनी समस्या के कारण हमारा जीवन गरीबी, दुख और तकलीफ में बीत जाता है।
संत ने कहा- मूर्खों! पत्ते तोड़ना समस्या का समाधान नहीं है। आज जितने तोड़ते हो, कल उससे भी अधिक और उग आते हैं। पत्ते तोड़ कर तुम इस पेड़ से छुटकारा नहीं पा सकते। इसके लिए तो तुम्हें इस पेड़ की जड़ ही काटनी पड़ेगी।
संत कहते है कि वे गांव वाले ही मूर्ख नहीं हैं, हम भी मूर्ख हैं। हमारे जीवन में भी एक पेड़ है। जो अनंत जन्मों से नित नई समस्या पैदा करता है। हम भी उन लोगों की तरह पत्ते तोड़ कर ही समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करते हैं। समस्या की जड़ नहीं काटते।
जगत का जन्म मरण का बंधन ही वह पेड़ है। आत्मस्वरूप का अज्ञान ही इस पेड़ की जड़ है। अपना आपा पहचान लेना ही इस जड़ को काट देना है। हमारे जीवन की समस्त समस्याओं का यही एकमात्र समाधान है..!!
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जय श्रीराम