अधूरा दीपक
बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से नगर में एक वृद्ध कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के दीपक बनाकर अपना जीवन यापन करता था। उसके बनाए दीपक पूरे नगर में प्रसिद्ध थे।
एक दिन उसने कई दीपक बनाकर धूप में सुखाने के लिए रख दिए। उनमें से एक दीपक थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा बन गया था। बाकी दीपक उसे देखकर हँसने लगे और कहने लगे – “तुम कभी किसी के काम नहीं आओगे, तुम तो अधूरे और बेढंगे हो।”
यह सुनकर वह दीपक बहुत उदास हो गया। उसे लगा कि सच में उसका कोई मूल्य नहीं है।
कुछ दिनों बाद दीपावली का त्योहार आया। लोग कुम्हार के पास दीपक खरीदने आए। सुंदर और एकदम सही दीपक जल्दी-जल्दी बिक गए, लेकिन वह टेढ़ा दीपक वहीं पड़ा रह गया।
शाम को जब एक गरीब बूढ़ी महिला वहाँ आई, तो उसने वही टेढ़ा दीपक उठा लिया। उसने कहा – “मुझे यही दीपक चाहिए।”
कुम्हार ने आश्चर्य से पूछा – “माँ, इतने अच्छे दीपक हैं, आप यही क्यों ले रही हैं?”
बूढ़ी महिला मुस्कुराकर बोली – “बेटा, मेरे घर की दीवार थोड़ी टेढ़ी है, यह दीपक वहीं ठीक से टिक जाएगा। और जब यह जलेगा, तो मेरे अंधेरे घर को रोशनी देगा।”
यह सुनकर वह दीपक बहुत खुश हुआ। पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसकी कमी ही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। उस रात जब वह दीपक जला, तो उसने पूरे घर को रोशन कर दिया। उसे समझ आ गया कि हर किसी का अपना एक महत्व होता है।
शिक्षा:- दोस्तों, जीवन में कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। हर किसी में कुछ ना कुछ कमी होती है, लेकिन वही कमी सही जगह पर हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
इसलिए खुद को कम मत समझिए, आप जैसे हैं वैसे ही अनमोल हैं।
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जय श्रीराम