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मिट्टी का खिलौना

मिट्टी का खिलौना – एक गांव में एक कुम्हार रहता था, वो मिट्टी के बर्तन व खिलौने बनाया करता था, और उसे शहर जाकर बेचा करता था। जैसे तैसे उसका गुजारा चल रहा था, एक दिन उसकी बीवी बोली कि...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-139

जय श्री राधे कृष्ण ……. "तात मातु हि सुनिअ पुकारा, एहिं अवसर को हमहि उबारा, हम जो कहा यह कपि नहिं होई, बानर रूप धरें सुर कोई ।। भावार्थ:- हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसर पर हमें कौन बचाएगा ?...

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सच्चा न्याय

सच्चा न्याय एक बार एक राजा शिकार खेलने गया  उसका तीर लगने से जंगलवासियों में से किसी का बच्चा मर गया । बच्चे की माँ विधवा थी और यह बच्चा उसका एकमात्र सहारा था । रोती-पीटती विधवा न्यायधीश के पास...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-138

जय श्री राधे कृष्ण ……. "देह बिसाल परम हरुआई, मंदिर तें मंन्दिर चढ़ धाई, जरइ नगर भा लोग बिहाला, झपट लपट बहु कोटि कराला ।। भावार्थ:- देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हल्की (फुर्तीली) है । वे दौड़ कर एक...

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पारिवारिक संस्कार व अनुशासन

पारिवारिक संस्कार व अनुशासन           उन महिलाओं के विषय में तो बहुत कुछ लिखा गया है, जो ससुराल में पीड़ित हुई हैं, लेकिन उन ससुराल वालों का क्या ? जो बहुओं से काफी दुःखी एवं पीड़ित हो रहे हैं...?....मेरे बहुत...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-137

जय श्री राधे कृष्ण ……. "निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारींं, भईं सभीत निसाचर नारीं ।। भावार्थ:- बन्धन से निकल कर वे सोने की अटारियों पर जा चढ़े । उनको देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं ।। हरि प्रेरित तेहि...

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अर्जित संपत्ति- मान सम्मान

अर्जित संपत्ति- मान सम्मान     “माँ आपको तो चाची जी को इतनी देर तक बिठाना ही नहीं चाहिए था उपर से आपने उनकी हर बात की हामी भर दी… अपना समय भूल गई क्या जब उन्होंने कैसे हम सब पर...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-136

जय श्री राधे कृष्ण ……. "बाजहिं ढोल देहिं सब तारी, नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी, पावक जरत देखि हनुमंता, भयहु परम लघु रूप तुरंता ।। भावार्थ:- ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं । हनुमान जी को नगर में...

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क्रोध

क्रोध रमा जैसे ही रसोई से बाहर आई वैसे ही रमेश चिल्ला उठा कि आज यह सब्जी क्यों बना दी वैस हीे मूड खराब है और फिर यह बेकार सब्जी। रमा ने पूछा कि आज तो मैने आपकी मनपसंद गोभी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-135

जय श्री राधे कृष्ण ……. "रहा न नगर बसन घृत तेला, बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला, कौतुक कँह आए पुरबासी, मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ।। भावार्थ:- (पूँछ के लपेटने में इतना कपड़ा और घी - तेल लगा कि) नगर...

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