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आटा आधा किलो

आटा आधा किलो एक दिन एक सेठ जी को अपनी सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा हुई लेखाधिकारी को तुरन्त बुलवाया गया। सेठ जी ने आदेश दिया, "मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति का मूल्य निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए, यह कार्य अधिकतम एक...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-212

जय श्री राधे कृष्ण ….. "रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ, दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ, माल्यवंत गृह गयउ बहोरी, कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ।। भावार्थ:- (रावण ने कहा), ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं ।...

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संत महिमा

संत महिमा एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे। एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था। एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-211

जय श्री राधे कृष्ण ….. "माल्यवंत अति सचिव सयाना, तासु बचन सुनि अति सुख माना, तात अनुज तव नीति बिभूषन, सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ।। भावार्थ:- माल्यवान नाम का एक बहुत ही बुध्दिमान मंत्री था । उसने उन...

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श्री राम चरित मानस के कुछ रहस्य

श्री राम चरित मानस के कुछ रहस्य श्रीराम रावण युद्ध में श्रीराम विजय के पश्चात स्वर्ग के राजा देवराज इन्द्र ने वानर सेना पर अमृत वर्षा की थी, जिससे सभी वानर जीवित हो उठे थे। लंका पँहुचने पर हनुमान जी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-210

जय श्री राधे कृष्ण ….. "बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस, परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ।। भावार्थ:- हे दशशीश! मैं बार - बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को...

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देवरानी – जेठानी ( बहुएं )

देवरानी - जेठानी ( बहुएं ) दीपा और नीता दोनों जेठानी-देवरानी। दीपा नौकरी करती थी और नीता घर संभालती थी। भरा-पूरा परिवार था, सास-ससुर, दोनों के दो बच्चे कुल 10 लोगों का परिवार। कई सालों बाद दोनों की बुआ सास...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-209

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा, जासु नाम त्रय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ।। भावार्थ:- जिसे सम्पूर्ण जगत से द्रोह करने का पाप लगा है,...

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जिम्मेदारी का भार

जिम्मेदारी का भार पंडित बलराम से उनकी पत्नी माया काफी समय से एक हार की मांग कर रही थी। हर बार पंडित उनकी बातों को टाल देते थे। वो कभी अपनी पत्नी से यह नहीं कह पाते थे कि उनके...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-208

जय श्री राधे कृष्ण ……. "ताहि बयरु तजि नाइअ माथा, प्रनतारति भंजन रघुनाथा, देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही, भजहु राम बिनु हेतु सनेही ।। भावार्थ:- वैर त्याग कर उन्हें मस्तक नवाइए । वे श्री रघुनाथ जी शरणागत का दु:ख नाश...

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