सुविचार-सुन्दरकाण्ड-292
जय श्री राधे कृष्ण ….. "राम तेज बल बुधि बिपुलाई, सेष सहस सत सकहिं न गाई, सक सर एक सोषि सत सागर, तव भ्रातहिं पूँछेउ नय नागर ।। भावार्थ:- श्री रामचंद्र जी के तेज (सामर्थ्य) बल और बुद्धि की अधिकता...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "राम तेज बल बुधि बिपुलाई, सेष सहस सत सकहिं न गाई, सक सर एक सोषि सत सागर, तव भ्रातहिं पूँछेउ नय नागर ।। भावार्थ:- श्री रामचंद्र जी के तेज (सामर्थ्य) बल और बुद्धि की अधिकता...
वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड- भाग 6 उन तीनों ने वह रात्रि ताटका वन में व्यतीत की। अगले दिन प्रातःकाल महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा, "महायशस्वी राजकुमार! ताटका वध के कारण मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। आज मैं बड़ी...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम, रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम ।। भावार्थ :- सब वानर - भालू सहज ही शूरवीर हैं, फिर उनके सिर पर प्रभु (सर्वेश्वर) श्री...
वाल्मीकि रामायण - अयोध्या काण्ड- भाग 5 दशरथ जी ने श्रीराम को प्रसन्नतापूर्वक महर्षि विश्वामित्र को सौंप दिया। आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे श्रीराम व उनके पीछे सुमित्रानंदन लक्ष्मण चल पड़े। उन दोनों भाइयों के हाथों में धनुष थे और उन्होंने...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा, ऐसहि बचन कहहिं सब कीसा, गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका, मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका ।। भावार्थ:- और रावण को मसल कर धूल में मिला देंगे। सब वानर ऐसे ही वचन कह...
वाल्मीकि रामायण - अयोध्या काण्ड- भाग 4 महाराज! आप पुत्र के मोह को अपने कर्तव्य के बीच मत आने दीजिए। पराक्रमी श्रीराम क्या हैं, इस बात को मैं भली-भांति जानता हूँ। महातेजस्वी वसिष्ठ जी व अन्य तपस्वी भी उस सत्य...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "परम क्रोध मीजहिं सब हाथा, आयसु पै न देहिं रघुनाथा, सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला, पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला ।। भावार्थ:- सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मींजते हैं । पर श्री...
वाल्मीकि रामायण - अयोध्या काण्ड- भाग 3 यज्ञ में आए सभी देवताओं ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की कि वे किसी प्रकार रावण को मारने का उपाय करें, उनकी बात सुनने पर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले, ‘देवताओं! से बोले उसने मुझसे...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "अस मैं सुना श्रवन दसकंधर, पदुम अठारह जूथप बंदर, नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं, जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं ।। भावार्थ:- हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो...
वाल्मीकि रामायण - अयोध्या काण्ड- भाग 2 महाराज दशरथ इस बात से हमेशा दुःखी और चिंतित रहते थे कि उनका कोई पुत्र नहीं था। यही सब सोचते-सोचते एक दिन उनके मन में विचार आया कि क्यों न पुत्र प्राप्ति के...