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Lalit Tripathi

Lalit Tripathi
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सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा
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कंपकपाते हाथ बेटे को आशीर्वाद

कंपकपाते हाथ बेटे को आशीर्वाद जल्दी जल्दी नींद में बिस्तर पर छूट गयी पेशाब को मनोहर जी साफ करने में लगे थे कि कहीं बहू बेटा ना देख ले.... कल ही तो बहू काजल ने दूसरी चादर बिछायी थी.... कितना...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-194

जय श्री राधे कृष्ण ……. "तव कुल कमल बिपिन दुखदाई, सीता सीत निसा सम आई, सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें, हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ।। भावार्थ:- सीता आप के कुल रूपी कमलों के वन को दु:ख देने वाली...

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कर्म

कर्मजिस प्रकार कर्म जीवन का स्वभाव है। उसी प्रकार कर्म फल का भोग भी जीवन की अनिवार्यता है। मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है। उस प्रकार का फल उसे न चाहते हुए भी देर-सबेर अवश्य भोगना ही पड़ता है।जाने-अनजाने...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-193

जय श्री राधे कृष्ण ……. "समुझत जासु दूत कइ करनी, स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी, तासु नारि निज सचिव बोलाई, पठवहु कंत जो चहहु भलाई|| भावार्थ:- जिनके दूत की करनी का विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसों की स्त्रियों के...

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प्रभु के नाम महिमा

प्रभु के नाम महिमा एक बार वृन्दावन के मंदिर में एक संत अक्षय तृतीया के दिन "श्री बांके बिहारी" के चरणों का दर्शन कर रहे थे। दर्शन करने के साथ साथ एक भाव भी गुनगुना रहे थे कि "श्री बिहारी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-192

जय श्री राधे कृष्ण ……. "रहसि जोरि कर पति पग लागी, बोली बचन नीति रस पागी, कंत करष हरि सन परिहरहू, मोर कहा अति हित हियँ धरहू ।। भावार्थ:- वह एकांत में हाथ जोड़ कर पति (रावण) के चरणों लगी...

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चुहिया का स्वयंवर

चुहिया का स्वयंवर गंगा नदी के तट पर कुछ तपस्वियों का आश्रम था जहाँ याज्ञवल्क्य नाम के ऋषि रहते थे। एक दिन वो नदी के किनारे आचमन कर रहे थे। उसी वक़्त आकाश में एक बाज अपने पंजे में एक...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-191

जय श्री राधे कृष्ण ……. "जासु दूत बल बरनि न जाई, तेहि आएँ पुर कवन भलाई, दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी, मंदोदरी अधिक अकुलानी ।। भावार्थ:- जिस के दूत के बल का वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर...

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शाश्वत सुख – शांति और सफलता का रहस्य

शाश्वत सुख – शांति और सफलता का रहस्य एक बुजुर्ग किसान मनीराम के दो बेटे थे । नाम था संकल्प और विकल्प । जब किसान का अंत समय नजदीक आया तो सोचा संपत्ति का बंटवारा कर जाऊ, वरना बाद में...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-190

जय श्री राधे कृष्ण ……. "उहाँ निसाचर रहहिं ससंका, जब तें जारि गयउ कपि लंका, निज निज गृह सब करहिं बिचारा, नहिं निसिचर कुल केर उबारा ।। भावार्थ:- वहाँ (लंका में) जब से हनुमान जी लंका को जला कर गए,...

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