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Lalit Tripathi

Lalit Tripathi
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सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा
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हाँ मेरी मेघा बेटी

हाँ मेरी मेघा बेटी शादी के लिए देखने गई मां ने समधन से कहा, शुभम मेरा एकलौता बेटा है, जैसा नाम वैसा गुण । जब जब मैं दूसरा बच्चा न होने के लिए उदास होती तो रमेश कहते, ईश्वर ने...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-214

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तव उर कुमति बसी बिपरीता, हित अनहित मानहु रिपु प्रीता, कालराति निसिचर कुल केरी, तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ।। भावार्थ:- आप के हृदय में उल्टी बुद्धि आ बसी है । इसी से आप हित...

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आज वो घर पर है

आज वो घर पर है घर जाने के लिए निकला। अशांत और विचलित मन लिए सब्जी मंडी पहुँचा कुछ सब्जियाँ खरीदीं। आज कुछ देर हो गई थी तो घर पहुँचकर खिचड़ी अथवा मैगी बना लेने का विचार चल रहा था।...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-213

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुमति कुमति सब कें उर रहही, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ।। भावार्थ:- हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि)...

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आटा आधा किलो

आटा आधा किलो एक दिन एक सेठ जी को अपनी सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा हुई लेखाधिकारी को तुरन्त बुलवाया गया। सेठ जी ने आदेश दिया, "मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति का मूल्य निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए, यह कार्य अधिकतम एक...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-212

जय श्री राधे कृष्ण ….. "रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ, दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ, माल्यवंत गृह गयउ बहोरी, कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ।। भावार्थ:- (रावण ने कहा), ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं ।...

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संत महिमा

संत महिमा एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे। एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था। एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-211

जय श्री राधे कृष्ण ….. "माल्यवंत अति सचिव सयाना, तासु बचन सुनि अति सुख माना, तात अनुज तव नीति बिभूषन, सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ।। भावार्थ:- माल्यवान नाम का एक बहुत ही बुध्दिमान मंत्री था । उसने उन...

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श्री राम चरित मानस के कुछ रहस्य

श्री राम चरित मानस के कुछ रहस्य श्रीराम रावण युद्ध में श्रीराम विजय के पश्चात स्वर्ग के राजा देवराज इन्द्र ने वानर सेना पर अमृत वर्षा की थी, जिससे सभी वानर जीवित हो उठे थे। लंका पँहुचने पर हनुमान जी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-210

जय श्री राधे कृष्ण ….. "बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस, परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ।। भावार्थ:- हे दशशीश! मैं बार - बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को...

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