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ईंटों के बीच दबे सपने

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ईंटों के बीच दबे सपने

एक छोटे से कस्बे में बारह वर्षीय अर्जुन रहता था। उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपने थे। वह पढ़-लिखकर अधिकारी बनना चाहता था ताकि अपने गाँव की तस्वीर बदल सके। लेकिन गरीबी ने उसके सपनों को जकड़ रखा था।

उसके पिता बीमार रहते थे और घर की जिम्मेदारी माँ के कंधों पर थी। मजबूरी में अर्जुन ने स्कूल छोड़ दिया और पास के एक पटाखा कारखाने में काम करने लगा। सुबह सूरज निकलने से पहले वह घर से निकल जाता और देर शाम थका हुआ लौटता। उसके हाथों में किताबों की जगह बारूद की धूल और छाले दिखाई देते थे

एक दिन उसी रास्ते से उसके पुराने स्कूल के शिक्षक दयाशंकर जी गुज़रे। उन्होंने अर्जुन को कारखाने में काम करते देखा तो उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने मालिक से बात की और अर्जुन से पूछा, “बेटा, तुम्हें यहाँ देखकर दुख हो रहा है। तुम तो पढ़ाई में सबसे आगे थे।”

अर्जुन ने सिर झुकाकर कहा, “गुरुजी, पेट की भूख किताबों से नहीं मिटती। अगर मैं काम नहीं करूँगा तो घर कैसे चलेगा?”

शिक्षक ने उसकी बात सुनी, लेकिन हार नहीं मानी। उन्होंने गाँव के कुछ लोगों और समाजसेवियों से मिलकर अर्जुन की पढ़ाई और परिवार की मदद का इंतज़ाम किया। कई लोगों ने पहले मना कर दिया। कुछ ने कहा, “एक बच्चे से क्या फर्क पड़ जाएगा?”

तब दयाशंकर जी ने मुस्कुराकर कहा, “फर्क एक बच्चे से नहीं, एक निर्णय से पड़ता है। अगर आज हमने इसे कारखाने से निकालकर स्कूल पहुँचा दिया, तो कल यह न जाने कितनों की जिंदगी बदल देगा।”

कुछ ही दिनों में अर्जुन फिर से स्कूल लौट आया। उसने दिन-रात मेहनत की। वर्षों बाद वही अर्जुन कठिन परीक्षाएँ पास कर प्रशासनिक अधिकारी बन गया।

पहली नियुक्ति मिलते ही उसने अपने जिले में बाल मजदूरी के खिलाफ विशेष अभियान शुरू कराया। जिन कारखानों में कभी बच्चे काम करते थे, वहाँ अब कानून का पालन होने लगा। कई गरीब बच्चों को छात्रवृत्ति मिली और सैकड़ों बच्चे फिर से स्कूल पहुँच गए

एक समारोह में अर्जुन ने कहा, “जब बच्चे कारखानों में मिलते हैं और स्कूल खाली दिखाई देते हैं, तब किसी भी देश की तरक्की अधूरी रह जाती है। असली विकास ऊँची इमारतों से नहीं, पढ़े-लिखे बच्चों से होता है।”

पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा। दयाशंकर जी की आँखों में गर्व के आँसू थे। उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने केवल एक बच्चे को नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के भविष्य को बचाया है।

शिक्षा ही वह शक्ति है जो गरीबी की जंजीरों को तोड़ सकती है। इसलिए बच्चों के हाथों में औज़ार नहीं, किताबें होनी चाहिए। जिस देश के विद्यालय आबाद होते हैं, उसी देश का भविष्य उज्ज्वल होता है।

जय श्री राम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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