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मर्यादा पुरुषोत्तम

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मर्यादा पुरुषोत्तम

चौदह वर्ष के वनवास से लौटने के बाद जब श्रीराम माता कैकेयी के चरण छूने पहुंचे, तो कैकेयी ने रोते हुए कहा – “राम, मैंने तुम्हें इतना कष्ट दिया, फिर भी तुम मुझे वही आदर क्यों दे रहे हो?” श्रीराम ने अत्यंत कोमल वाणी में कहा – “माते, यदि आप मुझे वन न भेजतीं, तो मैं केवल अयोध्या का राजा बनकर रह जाता। आपके उस कठोर निर्णय ने ही मुझे राक्षसों का संहार करने और मर्यादा पुरुषोत्तम बनने का अवसर दिया।

जीवन में जो लोग हमारे मार्ग में कांटे बिछाते हैं, वे अनजाने में हमें और अधिक मजबूत बना जाते हैं।” यह सिखाता है कि बीते हुए कड़वे पलों को भूलकर क्षमा करना है। मनुष्य को महान बनाता है।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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