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मेहनत अनुशासन और आत्मविश्वास

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मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास

सरस्वती विद्या स्कूल में आठवीं कक्षा के दो विद्यार्थी पढ़ते थे—शैतान सिंह और अभिलाषा। दोनों एक ही कक्षा में थे, लेकिन उनके स्वभाव बिल्कुल अलग थे।

शैतान सिंह बहुत बुद्धिमान था, लेकिन पढ़ाई को गंभीरता से नहीं लेता था। वह अक्सर दोस्तों के साथ शरारत करता, होमवर्क अधूरा छोड़ देता और सोचता, “परीक्षा से पहले दो-चार दिन पढ़ लूंगा, सब याद हो जाएगा।”

वहीं दूसरी ओर अभिलाषा साधारण परिवार की बेटी थी। उसके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। स्कूल से लौटने के बाद वह अपनी माँ के साथ घर के कामों में हाथ बंटाती, फिर भी रोज़ समय निकालकर मन लगाकर पढ़ाई करती। वह हमेशा कहती, “सफलता किस्मत से नहीं, रोज़ की मेहनत से मिलती है।”

कुछ ही दिनों बाद विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी और वार्षिक परीक्षा की घोषणा हुई। पूरे स्कूल में उत्साह का माहौल था।

शैतान सिंह ने सोचा, “अभी तो बहुत समय है, बाद में तैयारी कर लूँगा।” लेकिन वह खेल-कूद और मोबाइल में ही समय बिताता रहा।

दूसरी ओर अभिलाषा ने एक छोटी-सी डायरी बनाई। उसमें उसने हर दिन का लक्ष्य लिखा। वह रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ती, कठिन विषयों को अपने शिक्षकों से समझती और जो समझ में आ जाता, उसे अपने दोस्तों को भी सिखाती।

धीरे-धीरे प्रदर्शनी का दिन आ गया। अभिलाषा ने अपने साथियों के साथ मिलकर वर्षा जल संरक्षण का सुंदर मॉडल तैयार किया। शिक्षकों और अतिथियों ने उसकी बहुत प्रशंसा की।

उधर शैतान सिंह ने अंतिम समय में जल्दी-जल्दी मॉडल बनाने की कोशिश की, लेकिन तैयारी अधूरी होने के कारण उसका मॉडल सही ढंग से काम नहीं कर पाया। उसे बहुत निराशा हुई।

अब वार्षिक परीक्षा भी शुरू हो गई। अभिलाषा पूरे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा देती रही, जबकि शैतान सिंह को कई प्रश्नों के उत्तर याद ही नहीं आए। परीक्षा समाप्त होने के बाद उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।

कुछ सप्ताह बाद परिणाम घोषित हुआ। अभिलाषा पूरे विद्यालय में प्रथम आई। प्रधानाचार्य ने मंच पर उसे सम्मानित करते हुए कहा, “अभिलाषा की सफलता हमें सिखाती है कि कठिन परिस्थितियाँ कभी भी मेहनती इंसान का रास्ता नहीं रोक सकतीं।”

शैतान सिंह के अंक अपेक्षा से बहुत कम आए। वह उदास होकर एक कोने में बैठा था। तभी अभिलाषा उसके पास आई और मुस्कुराकर बोली, “हार अंत नहीं होती। अगर आज से मेहनत शुरू कर दो, तो अगली बार सफलता तुम्हारी होगी।”

उस दिन शैतान सिंह ने मन ही मन संकल्प लिया कि अब वह समय का सदुपयोग करेगा। उसने रोज़ पढ़ाई शुरू की, शिक्षकों का सम्मान किया, शरारतें कम कर दीं और अनुशासन को अपनी आदत बना लिया।

अगले वर्ष जब परीक्षा का परिणाम आया, तो इस बार शैतान सिंह भी कक्षा के श्रेष्ठ विद्यार्थियों में शामिल था। मंच पर पुरस्कार लेते समय उसने कहा, “मैंने सीखा है कि प्रतिभा तभी चमकती है, जब उसके साथ मेहनत और अनुशासन जुड़ जाए।”

पूरा विद्यालय तालियों से गूँज उठा। उस दिन बच्चों ने समझ लिया कि सफलता किसी एक दिन की मेहनत से नहीं, बल्कि रोज़ किए गए छोटे-छोटे प्रयासों से मिलती है।

कहानी से शिक्षा-समय का सम्मान करने वाला, मेहनत को अपना साथी बनाने वाला और हार से सीखने वाला विद्यार्थी ही जीवन में सच्ची सफलता प्राप्त करता है।”

जय श्री राम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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