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साधना का प्रताप

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साधना का प्रताप

पुराने समय की बात है एक आश्रम में बहुत से शिष्य रहते थे और वह सब आपस में बातें किया करते थे कि मुझे आज ऐसा अनुभव हुआ, कोई कहता मुझे इस तरह का अनुभव हुआ, हर कोई अपने-अपने अनुभव आपस में शेयर किया करते थे, जिसमें एक शिष्य ऐसा भी था जिसे कोई अनुभव हुआ ही नहीं था, उसने सोचा मेरा जीवन क्या ऐसे ही व्यर्थ हुआ, सबको कुछ ना कुछ अनुभव होता है मुझे कोई अनुभव क्यों नहीं होता, क्या आश्रम में मेरा समय नष्ट जा रहा है, यही सब सोच कर उसने अपने गुरु जी से पूछा कि गुरुवर आश्रम में सभी को कुछ ना कुछ अनुभव होता है तो मुझे क्यों नहीं होता, क्या मेरी तपस्या में मेरी साधना में कोई कमी रह गई है ??

गुरु जी ने बड़े सम्मान से उत्तर दिया कि तुम कल से आश्रम के बाहर एकांत में जाकर साधना करना और फिर आकर मुझे अनुभव बताना।

दूसरे दिन वह शिष्य आश्रम से दूर एकांत में जाकर एक वृक्ष के नीचे बैठकर साधना करने लगा, जिस वृक्ष के नीचे वह साधना करने बैठा उस वृक्ष पर दो कौवे पहले से बैठे हुए थे उसने ध्यान नहीं दिया और अपनी साधना में लीन हो गया। साधना खत्म करके जब वह उठा तो उसने देखा जिस स्थान पर दोनों कौवे बैठे थे उस स्थान पर दो हंस बैठे हैं, शिष्य ने ध्यान नहीं दिया और सीधे आश्रम आ गया। दूसरे दिन फिर जब वह वृक्ष के नीचे गया तो वहां पहले से ही दो हंस बैठे थे, वह शिष्य उनकी तरफ ध्यान न देकर फिर से अपनी साधना में लीन हो गया।

जब उसने ध्यान तोड़ा तो देखा दो हंस की जगह दो दिव्य आत्माएं हो गई थी और दोनों दिव्य आत्माएं वृक्ष से नीचे उतरी पुष्पक विमान आया उसके सामने वह दोनों दिव्य आत्माएं पुष्पक विमान में बैठकर उसे नमस्कार करके स्वर्ग को चली गई। ऐसा चमत्कार देखकर उसे कुछ समझ नहीं आया उसने आश्रम में आकर सीधा गुरुजी के पास जाकर प्रणाम करके बोला हे गुरुदेव आज तो मुझे कुछ आश्चर्यजनक चीज दिखा।

गुरु जी ने पूछा क्या देखा तुमने??, उसने कहा जब मैं पहले दिन वृक्ष के नीचे साधना करने गया तो वहां दो कौवे बैठे थे, साधना खत्म करके मैं आ रहा था तो देखा उन कौवा की जगह पर दो हंस बैठे थे और आज मैंने उन दोनों हंसो को दिव्य आत्मा के रूप में देखा और मेरे सामने पुष्पक विमान आया और दोनों स्वर्ग को चले गए…!

तब गुरु जी ने हंसकर कहां यह तुम्हारी साधना का प्रताप है जिसके कारण दोनों कौवे हंस बने और हंस दिव्य आत्मा बनकर स्वर्ग को चले गए।

तब शिष्य के समझ में आया की संत के संपर्क में आने से कौवे भी हंस बन जाते हैं।

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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