मजिस्ट्रेट का दूरदर्शी निर्णय
स्वामी से अलग होने की ज़िद लेकर एक महिला मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुई। पति भी भयभीत अवस्था में उपस्थित हुआ। दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनकर मजिस्ट्रेट महोदया ने सिर पकड़ लिया। सिरदर्द की एक दवा खाने के बाद उन्होंने अपना निर्णय मेज़ पर रख दिया। अब वकील उस फ़ैसले को पढ़ने की प्रतीक्षा करने लगे। अभागा पति कभी अपने वकील की ओर, कभी दूसरे वकील की ओर देख रहा था, और कभी नज़र बचाकर पत्नी की ओर भी ताक रहा था।
फ़ैसला सुनाने से पहले मजिस्ट्रेट महोदया ने महिला से पूछा—“क्या तुम अपने निर्णय पर फिर से सोचने के लिए कुछ समय चाहती हो?”
महिला ने अपने वकील की ओर देखकर नकारात्मक रूप से सिर हिला दिया। मजिस्ट्रेट महोदया स्वयं भी एक महिला थीं, इसलिए स्थिति को संभालने का प्रयास कर रही थीं।
उन्होंने कहा—“तुम्हें छह महीने का समय दिया जाता है। इस अवधि में तुम चाहो तो पति के साथ रह सकती हो, या मायके में भी रह सकती हो। अगली तारीख छह महीने पूरे होने के बाद होगी।”
फ़ैसला सुनते ही अदालत में सन्नाटा छा गया। दोनों पक्षों के वकील अपनी-अपनी दलीलें देते रहे, लेकिन मजिस्ट्रेट महोदया अपने निर्णय पर अडिग रहीं। आख़िरकार, एक महिलसुख-शांति महिला के दर्द को समझ सकती है—ख़ासकर पति से अलग रहने की पीड़ा को।
मायके पहुँचते ही महिला का बड़े आदर से स्वागत किया गया। किसी ने कुछ नहीं पूछा। घूमना-फिरना, सैर-सपाटा—कभी बहन के घर, कभी मामी के, कभी बुआ के घर, तो कभी सहेलियों के साथ अलग-अलग दर्शनीय स्थलों पर। दो-तीन महीने कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला।
फिर माँ ने धीरे-धीरे पूछना शुरू किया—“बेटी, अगली तारीख़ में अब कितने दिन बचे हैं? क्या सोचा है?… दामाद जी से बात करके देखो।”
भाई और भाभी की फुसफुसाहट भी कभी-कभी कानों में चुभने लगी। भतीजे-भतीजियाँ तो सबके सामने ही कहने लगे—“बुआ कब अपने घर जाएँगी? हमारे घर में ही तो रहती हैं।”
पिता कुछ नहीं कहते थे, लेकिन मन ही मन बेटी को इस हालत में देखकर चिंतित रहते थे। कुल मिलाकर, बेटी और बहन सबके लिए बोझ सी बनती जा रही थी। पड़ोसियों की तरह-तरह की बातें कानों तक पहुँचती थीं, मगर किसी से कुछ कहा नहीं जाता था।
अपने ही घर में ऐसा व्यवहार महिला को असह्य लगने लगा। कभी इसी घर में वह अपने अधिकार के लिए लड़ी थी। और अब वह खुलकर बात भी नहीं कर पा रही थी—लड़ाई या अधिकार की बात तो बहुत दूर की थी। अब सब उसे ही दोषी ठहराने में लगे थे—“ज़रूर तुममें ही कोई कमी रही होगी, तभी तो पति से अलग होना चाहती हो।”
घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया, क्योंकि बाहर की महिलाएँ उसे घूर-घूरकर देखने लगीं। चरम अपमान—अपने ही मायके में इतना अनादर!
तरह-तरह की कटु टिप्पणियाँ सुनने के बाद आख़िरकार महिला समझ गई कि शादी के बाद एक स्त्री का सम्मान वास्तव में उसके ससुराल में ही होता है। पति ही उसकी सारी गलतियाँ सहन कर सकता है और क्षमा भी कर सकता है। शादी के बाद एक स्त्री सम्मान के साथ पति के साथ ही रह सकती है और सुरक्षा भी वहीं पाती है। यह बात समझने में उसे तीन महीने लग गए।
अब मायके के लोग भी राहत की साँस लेने लगे और… दामाद जी को फ़ोन किया गया। उन्हें बताया गया—“बेटी को अपनी गलती का एहसास हो गया है, आकर उसे ले जाइए। वह तो कब से आपकी प्रतीक्षा कर रही है।”
पति ने कहा—“अभी तो सिर्फ़ तीन महीने ही हुए हैं, बाद में फिर झगड़ा करेगी तो?”
तब पत्नी ने ख़ुद बात की और कहा—“मुझे माफ़ कर दीजिए।
मैं समझ गई हूँ कि शादी के बाद मायके में ज़्यादा दिन रहने से सम्मान नहीं मिलता। हर परिस्थिति में पति ही साथ निभाते हैं।”
इसके बाद पति आया और उसे अपने साथ ले गया। मजिस्ट्रेट के सही और दूरदर्शी निर्णय के कारण उनका जीवन फिर से सुख-शांत से बीतने लगा।
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जय श्रीराम