सच्चा ह्रदय
समय बीतता गया। भैरव सेठ का जीवन अब पहले जैसा नहीं रहा था। कभी जिस व्यक्ति के नाम से पूरा बाजार कांपता था, आज वही व्यक्ति सुबह सबसे पहले मंदिर की सीढ़ियां धोता था। जो हाथ कभी गरीबों को धक्का देते थे, वही हाथ अब भूखों को भोजन परोसते थे। लोग उसे देखकर हैरान होते थे। कई लोगों को विश्वास ही नहीं होता था कि यह वही भैरव सेठ है जिसने कभी अहंकार में भगवान के भक्तों का अपमान किया था। लेकिन भगवान की लीला अभी समाप्त नहीं हुई थी।
एक दिन भैरव सेठ मंदिर के प्रांगण में बैठा था। उसके सामने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के दिव्य विग्रह विराजमान थे। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। वह मन ही मन कह रहा था, “प्रभु, आपने मेरा धन ले लिया, मेरा अभिमान तोड़ दिया, मेरा झूठा वैभव छीन लिया। लेकिन बदले में मुझे आपका सच्चा मार्ग दिखा दिया। अब मेरे जीवन में और क्या शेष है? उसी रात उसे एक अद्भुत स्वप्न दिखाई दिया।
उसने देखा कि पूरा नीलाचल दिव्य प्रकाश से जगमगा रहा है। शंखों की ध्वनि गूंज रही है। हजारों दीपक जल रहे हैं। और उस दिव्य प्रकाश के मध्य स्वयं भगवान जगन्नाथ खड़े हैं। प्रभु मुस्कुराकर बोले भैरव तुम्हारी परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई है। भैरव ने कांपते हुए हाथ जोड़ लिए। प्रभु अब मुझमें और क्या परीक्षा सहने की शक्ति है? भगवान बोले “जब मनुष्य धनवान होता है तब विनम्र होना कठिन होता है। लेकिन जब मनुष्य निर्धन हो जाए और फिर भी उसके मन में ईश्वर के प्रति प्रेम बना रहे, वही सच्ची भक्ति है।”
अगली सुबह भैरव जागा तो उसने उस स्वप्न को अपने हृदय में संजो लिया। उसने निश्चय किया कि अब वह जीवनभर भगवान के नाम पर सेवा करेगा। धीरे धीरे उसकी छोटी सी दुकान फिर चलने लगी। लेकिन इस बार उसमें छल नहीं था। लालच नहीं था। वह ग्राहकों से उचित मूल्य लेता। गरीबों को उधार देता। भूखे को भोजन कराता। और हर शाम अपनी कमाई का एक भाग मंदिर में अन्नदान के लिए समर्पित कर देता।
नगर के लोग कहते थे कि पहले उसकी दुकान में धन था, लेकिन अब वहां भगवान का आशीर्वाद है। इसी बीच एक और घटना घटी जिसने पूरे नगर को चौंका दिया। एक दिन एक वृद्ध साधु नगर में आए। उनके वस्त्र फटे हुए थे। पैरों में चप्पल तक नहीं थी। कई लोगों ने उन्हें अनदेखा कर दिया। कुछ ने उनका उपहास भी किया।
लेकिन भैरव सेठ ने जैसे ही उन्हें देखा, वह तुरंत दौड़कर उनके पास पहुंचा। उसने उनके चरण धोए, उन्हें भोजन कराया और अपने घर में विश्राम करने का आग्रह किया। उसकी पत्नी यह दृश्य देखकर मुस्कुरा रही थी। उसे याद था कि कभी यही भैरव किसी गरीब को अपनी दुकान के सामने खड़ा तक नहीं होने देता था। रात को वही वृद्ध साधु उसके घर में ठहरे। आधी रात के समय भैरव की आंख खुली तो उसने देखा कि पूरे कमरे में दिव्य प्रकाश फैल गया है। वह घबरा कर उठ बैठा और फिर जो उसने देखा, उसे देखकर उसकी सांसें थम गईं।
वह साधु कोई साधारण मनुष्य नहीं थे। उनके स्थान पर स्वयं भगवान जगन्नाथ खड़े थे। भैरव कांपते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा। उसकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। वह बोला प्रभु मैं इस योग्य नहीं हूं। भगवान ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोले भैरव, जब तुम धनवान थे तब तुम्हारे पास सब कुछ था लेकिन तुम्हारा हृदय खाली था। आज तुम्हारे पास पहले जितना धन नहीं है, लेकिन तुम्हारा हृदय प्रेम, दया और विनम्रता से भर चुका है। और मेरे लिए वही सबसे बड़ा धन है।”
भैरव फूट फूट कर रोने लगा भगवान आगे बोले, स्मरण रखो भक्ति केवल पूजा नहीं है। भक्ति केवल मंत्र नहीं है। भक्ति केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। सच्ची भक्ति तब है जब तुम मेरे हर जीव में मुझे देखो। जब भूखे को भोजन दो, दुखी को सहारा दो और किसी का अपमान करने से पहले उसके भीतर बैठे भगवान को पहचानो। इतना कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
अगली सुबह जब भैरव मंदिर पहुंचा तो उसके चेहरे पर एक अद्भुत तेज था। लोगों ने पूछा कि क्या हुआ है। लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया उसने केवल इतना कहा भगवान को पाने के लिए बड़े यज्ञ, बड़े दान और बड़े महलों की आवश्यकता नहीं होती। उन्हें केवल एक सच्चा हृदय चाहिए। कई वर्षों बाद जब भैरव का अंतिम समय आया, तब पूरा नगर उसके घर के बाहर खड़ा था। उसकी आंखें मंदिर के शिखर पर लगी थीं। उसके होंठों पर अंतिम शब्द थे जय जगन्नाथ जय महादेव
कहते हैं उसी क्षण मंदिर की घंटियां अपने आप बजने लगीं। समुद्र की लहरें असामान्य रूप से शांत हो गईं। और भगवान जगन्नाथ के श्रीमुख पर एक मधुर मुस्कान दिखाई दी। लोगों ने समझ लिया कि आज एक ऐसी आत्मा अपने प्रभु के पास लौट गई है जिसने अहंकार से विनम्रता तक की यात्रा पूरी कर ली थी। तभी से पूरी के कुछ पुराने पंडा यह कथा सुनाते हुए कहते हैं l
भगवान शिव अपने भक्त को प्रेम देते हैं और भगवान जगन्नाथ उसे सही मार्ग दिखाते हैं। दोनों की कृपा मिल जाए तो पत्थर जैसा हृदय भी सोने से अधिक मूल्यवान बन जाता है। और इस कथा का संदेश यही है कि ईश्वर को आपका धन नहीं चाहिए, आपका पद नहीं चाहिए, आपका अहंकार तो बिल्कुल नहीं चाहिए। उन्हें केवल एक सच्चा, निर्मल और दयालु हृदय चाहिए।
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जय श्रीराम