सुविचार-सुन्दरकाण्ड-195
जय श्री राधे कृष्ण ……. "राम बान अहिगन सरिस, निकर निसाचर भेक, जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ।। भावार्थ:- श्री राम जी के बाण सर्पो के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेंढक...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "राम बान अहिगन सरिस, निकर निसाचर भेक, जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ।। भावार्थ:- श्री राम जी के बाण सर्पो के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेंढक...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "तव कुल कमल बिपिन दुखदाई, सीता सीत निसा सम आई, सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें, हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ।। भावार्थ:- सीता आप के कुल रूपी कमलों के वन को दु:ख देने वाली...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "समुझत जासु दूत कइ करनी, स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी, तासु नारि निज सचिव बोलाई, पठवहु कंत जो चहहु भलाई|| भावार्थ:- जिनके दूत की करनी का विचार करते ही (स्मरण आते ही) राक्षसों की स्त्रियों के...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "रहसि जोरि कर पति पग लागी, बोली बचन नीति रस पागी, कंत करष हरि सन परिहरहू, मोर कहा अति हित हियँ धरहू ।। भावार्थ:- वह एकांत में हाथ जोड़ कर पति (रावण) के चरणों लगी...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "जासु दूत बल बरनि न जाई, तेहि आएँ पुर कवन भलाई, दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी, मंदोदरी अधिक अकुलानी ।। भावार्थ:- जिस के दूत के बल का वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "उहाँ निसाचर रहहिं ससंका, जब तें जारि गयउ कपि लंका, निज निज गृह सब करहिं बिचारा, नहिं निसिचर कुल केर उबारा ।। भावार्थ:- वहाँ (लंका में) जब से हनुमान जी लंका को जला कर गए,...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर, जहं तहं लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ।। भावार्थ:- इस प्रकार कृपा निधान श्री राम जी समुद्र तट पर जा उतरे । अनेकों रीछ - वानर...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई, गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई, रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी, जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ।।...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खर भरे, मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे, कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं, जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "नख आयुध गिरि पादपधारी, चले गगन महि इच्छाचारी, केहरिनाद भालु कपि करहीं, डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ।। भावार्थ:- नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक - टोक) चलने वाले रीछ - वानर पर्वतों और...