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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-190

जय श्री राधे कृष्ण ……. "उहाँ निसाचर रहहिं ससंका, जब तें जारि गयउ कपि लंका, निज निज गृह सब करहिं बिचारा, नहिं निसिचर कुल केर उबारा ।। भावार्थ:- वहाँ (लंका में) जब से हनुमान जी लंका को जला कर गए,...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-189

जय श्री राधे कृष्ण ……. "एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर, जहं तहं लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ।। भावार्थ:- इस प्रकार कृपा निधान श्री राम जी समुद्र तट पर जा उतरे । अनेकों रीछ - वानर...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-188

जय श्री राधे कृष्ण ……. "सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई, गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई, रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी, जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ।।...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-187

जय श्री राधे कृष्ण ……. "चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खर भरे, मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे, कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं, जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-186

जय श्री राधे कृष्ण ……. "नख आयुध गिरि पादपधारी, चले गगन महि इच्छाचारी, केहरिनाद भालु कपि करहीं, डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ।। भावार्थ:- नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक - टोक) चलने वाले रीछ - वानर पर्वतों और...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-185

जय श्री राधे कृष्ण ……. "जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई, असगुन भयउ रावनहि सोई, चला कटकु को बरनैं पारा, गर्जहिं बानर भालु अपारा ।। भावार्थ:- जानकी जी को जो - जो शकुन होते थे, वही - वही रावण के लिए...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-184

जय श्री राधे कृष्ण ……. "जासु सकल मंगलमय कीती, तासु पयान सगुन यह नीती, प्रभु पयान जाना बैदेहीं, फरकि बाम अंग जनु कहि देहीं ।। भावार्थ:- जिन की कीर्ति सब मंगलों से परिपूर्ण है, उन के प्रस्थान के समय शकुन...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-183

जय श्री राधे कृष्ण ……. "राम कृपा बल पाइ कपिंदा, भए पच्छजुत मनहुँ गिरिन्दा, हरषि राम तब कीन्ह पयाना, सगुन भए सुंदर सुभ नाना ।। भावार्थ:- राम कृपा का बल पा कर श्रेष्ठ वानर मानो पंख वाले बड़े पर्वत हो...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-182

जय श्री राधे कृष्ण ……. "प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा, गर्जहिं भालु महाबल कीसा, देखी राम सकल कपि सेना, चितइ कृपा करि राजिव नयना ।। भावार्थ:- वे प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाते हैं । महान बलवान रीछ और...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-180

जय श्री राधे कृष्ण ……. "अब बिलंबु केहि कारन कीजे, तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे, कौतुक देखि सुमन बहु बरषी, नभ तें भवन चले सुर हरषी ।। भावार्थ:- अब विलंब किस कारण किया जाए ? वानरों को तुरंत आज्ञा दो...

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