सुविचार-सुन्दरकाण्ड-211
जय श्री राधे कृष्ण ….. "माल्यवंत अति सचिव सयाना, तासु बचन सुनि अति सुख माना, तात अनुज तव नीति बिभूषन, सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ।। भावार्थ:- माल्यवान नाम का एक बहुत ही बुध्दिमान मंत्री था । उसने उन...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "माल्यवंत अति सचिव सयाना, तासु बचन सुनि अति सुख माना, तात अनुज तव नीति बिभूषन, सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ।। भावार्थ:- माल्यवान नाम का एक बहुत ही बुध्दिमान मंत्री था । उसने उन...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस, परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ।। भावार्थ:- हे दशशीश! मैं बार - बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा, जासु नाम त्रय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ।। भावार्थ:- जिसे सम्पूर्ण जगत से द्रोह करने का पाप लगा है,...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "ताहि बयरु तजि नाइअ माथा, प्रनतारति भंजन रघुनाथा, देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही, भजहु राम बिनु हेतु सनेही ।। भावार्थ:- वैर त्याग कर उन्हें मस्तक नवाइए । वे श्री रघुनाथ जी शरणागत का दु:ख नाश...
जय श्री राधे कृष्ण ……. " गो द्विज धेनु देव हितकारी, कृपा सिंधु मानुष तनुधारी, जन रंजन भंजन खल ब्राता, बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ।। भावार्थ :- उन कृपा के समुद्र भगवान ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का...
जय श्री राधे कृष्ण ……. " तात राम नहिं नर भूपाला, भुवनेस्वर कालहु कर काला, ब्रह्म अनामय अज भगवंता, ब्यापक अजित अनादि अनंता ।। भावार्थ:- हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं, वे समस्त लोकों के स्वामी और...
जय श्री राधे कृष्ण ……. " काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ, सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ।। भावार्थ:- हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ - ये सब नरक के रास्ते हैं । इन...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "चौदह भुवन एक पति होई, भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई, गुन सागर नागर नर जोऊ, अलप लोभ भल कहइ न कोऊ ।। भावार्थ:- चौदहों भुवनों का एक ही स्वामी हो, वह भी जीवों से वैर...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "जो आपन चाहै कल्याना, सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना, सो परनारि लिलार गोसाईं, तजउ चउथि के चंद कि नाईंं ।। भावार्थ:- जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन, बोला बच पाइ अनुसासन, जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता, मति अनुरूप कहउँ हित ताता ।। भावार्थ:- फिर वे सिर नवा कर अपने आसन पर बैठ गये और आज्ञा पाकर...