जय श्री राधे कृष्ण …..
“राम तेज बल बुधि बिपुलाई, सेष सहस सत सकहिं न गाई, सक सर एक सोषि सत सागर, तव भ्रातहिं पूँछेउ नय नागर ।।
भावार्थ:– श्री रामचंद्र जी के तेज (सामर्थ्य) बल और बुद्धि की अधिकता को लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं। परंतु नीति निपुण श्री राम जी ने (नीति की रक्षा के लिए) आपके भाई से उपाय पूछा….!
सुप्रभात
आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो..