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Lalit Tripathi

Lalit Tripathi
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सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा
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स्वर्ग की मिट्टी

स्वर्ग की मिट्टी एक पापी इन्सान मरते वक्त बहुत दुख और पीड़ा भोग रहा था। लोग वहाँ काफी संख्या में इकट्ठे हो गये। वहीं पर एक महापुरूष आ गये, पास खड़े लोगों ने महापुरूष से पूछा कि आप इसका कोई...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-274

जय श्री राधे कृष्ण ….. "बहु प्रकार मारन कपि लागे, दीन पुकारत तदपि न त्यागे, जो हमार हर नासा काना, तेहि कोसलाधीस कै आना ।। भावार्थ:- वानर उन्हें बहुत तरह से मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे । फिर...

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कलयुग का दरोगा

कलयुग का दरोगा गरीब किसान के खेत में बिना बोये लौकी का पौधा उग आया। बड़ा हुआ तो उसमे तीन लौकियाँ लगीं। उसने सोचा, उन्हें बाजार में बेचकर घर के लिए कुछ सामान ले आएगा। अतः वो तीन लौकियाँ लेकर...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-273

जय श्री राधे कृष्ण ….. "कह सुग्रीव सुनहु सब बानर, अंग भंग करि पठवहु निसिचर, सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए, बांधि कटक चहु पास फिराए ।। भावार्थ:- सुग्रीव ने कहा - सब वानरो ! सुनो, राक्षसों के अंग भंग करके...

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चंदन और कीचड़

चंदन और कीचड़ एक दिन चंदन और कीचड़ का मिलन हो गया। दोनों अपनी-अपनी प्रशंसा के पुल बांधने लगे। चंदन बोला-‘भाई कर्दम ! मेरी बराबरी तू नहीं कर सकता । मेरी शीतलता से सारा संसार परिचित है। मेरे में इतनी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-272

जय श्री राधे कृष्ण ….. "प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ, अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ, रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने, सकल बांधि कपीस पहिं आने ।। भावार्थ:- फिर वे प्रकट रूप में भी अत्यंत प्रेम के साथ श्री राम जी...

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मेरी छोटी बुआ

मेरी छोटी बुआ रक्षाबंधन का त्यौहार पास आते ही मुझे सबसे ज्यादा जमशेदपुर (झारखण्ड )वाली बुआ जी की राखी के कूरियर का इन्तेज़ार रहता था! कितना बड़ा पार्सल भेजती थी बुआ जी! तरह-तरह के विदेशी ब्रांड वाले चॉकलेट,गेम्स, मेरे लिए...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-271

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह, प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ।। भावार्थ:- कपट से वानर का शरीर धारण कर उन्होंने सब लीलाएं देखीं। वे अपने ह्रदय में प्रभु के गुणों...

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कृष्णा हमारी पुकार सुन रहे है👂

कृष्णा हमारी पुकार सुन रहे है👂 मीरा जी जब भगवान कृष्ण के लिए गाती थी तो भगवान बड़े ध्यान से सुनते थे। सूरदास जी जब पद गाते थे तब भी भगवान सुनते थे। और कहाँ तक कहूँ कबीर जी ने...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-270

जय श्री राधे कृष्ण ….. "प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई, बैठे पुनि तट दर्भ डसाई, जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए, पाछें रावन दूत पठाए ।। भावार्थ:- उन्होंने पहले सिर नवा कर प्रणाम किया। फिर किनारे पर कुश बिछा कर बैठ...

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