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अम्मा जी भोजन के साथ टेंशन ना परोसो

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अम्मा जी भोजन के साथ टेंशन ना परोसो

रात के नौ बज चुके थे। दुकान से थका हारा मनोहर अभी खाना खाने बैठा था। पहला निवाला तोड़कर अभी मुंह में रखा ही था कि अम्मा जी ने अपना रोज का बड़ बढ़ाना शुरू कर दिया।

” अरे कब से कह रही हूं सबको कि विम्मी के ससुराल में क्या-क्या देना है, जरा एक बार उसके पर्ची तैयार करवा कर ला दो। बाद में ऐन मौके पर सब भागते फिरेंगे। ऊपर से मेरी दवाई भी कल खत्म हो जाएगी। लेकिन लाकर नहीं दे रहे। भगवान ने ऐसी औलाद दी है जो कोई काम समय पर नहीं करती। बस बैठे-बैठे आराम की जिंदगी जीने की आदत हो गई है”

खाना खाते-खाते मनोहर के हाथ रुक गए। मन कसैला हो गया। उसने एक नजर अपनी पत्नी मालती की तरफ देखा पर कुछ कहा नहीं। पर मालती तो समझ गई कि मनोहर का मन कसैला हो चुका है। पर पता नहीं क्या सोचकर मनोहर ने कहा,…” अम्मा महेश था‌ ना घर पर। उससे कह देती वो ले आता। उसे भी तो थोड़ी सी जिम्मेदारी दिया करो”

” हां, बस अब छोटे भाई पर अपना काम डालकर अपनी जिम्मेदारियां से हाथ जोड़ लो। वो भी दिन भर भाग दौड़ करता है। फालतू बैठा नहीं रहता। जब देखो बस उसके पीछे पड़ जाता है”

अम्मा ने एक बात की जगह दस बातें सुना दी। जैसे तैसे मनोहर ने एक रोटी खत्म की। आगे उससे खाते नहीं बना तो  खाना खाते-खाते उठ गया। और हाथ धोकर अपने कमरे में आकर लेट गया। मालती पीछे-पीछे कमरे में आई और उससे बोली, ” आप खाना तो खा लेते। भला एक रोटी से कोई पेट भरता है?”

” मेरा पेट तो अम्मा की बातों से ही भर जाता है। रोटी की क्या जरूरत है”…मनोहर ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा। मालती को समझ में आ चुका था कि मनोहर ने खाना क्यों नहीं खाया। उसने धीरे से पूछा, ” आप कहो तो आपके लिए एक गिलास दूध ले आऊं। भला भूखे पेट नींद कैसे आएगी “

” नहीं, रहने दो। इच्छा नहीं है। तुमने खाना खा लिया”

” हां, बच्चों के साथ ही खा लिया था”

” ठीक है। मैं आराम करना चाहता हूं। सुबह फिर जल्दी उठकर दुकान जाना है। तुम भी अपना काम पूरा कर जल्दी से सो जाओ। तुम्हें भी तो जल्दी उठना पड़ता है”…..कह कर मनोहर बिस्तर पर दूसरी तरफ करवट कर लेट गया। इधर मालती चुपचाप रसोई में आ गई और अपना बचा हुआ काम निपटाने लगी।

मालती को सचमुच मनोहर के लिए बहुत बुरा लगता था। अम्मा जी की आदत थी अक्सर मनोहर जब भी खाना खाने बैठता, तब कोई ना कोई बात को लेकर क्लेश कर देती थी। अम्मा जी के दो बेटे थे मनोहर और महेश, जबकि एक बेटी विम्मी थी। तीनों ही बच्चों का विवाह हो चुका था।

बड़ा बेटा मनोहर जहां एक परचूनी की दुकान संभालता था और उसकी पत्नी मालती घर संभालती थी। वही छोटा बेटा महेश एक कार रिपेयरिंग की दुकान पर काम करता था। और पत्नी ममता एक स्कूल में टीचर थी। दोनों पति-पत्नी मिलकर कमाते थे, लेकिन हर महीने एकमुश्त पांच हजार रुपए देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते थे। अम्मा इन्हीं पांच हजार रुपयों पर नाज करती थी।

इसके अलावा के सारे खर्चे मनोहर को ही करने पड़ते थे। या यूं कहे कि अम्मा जानबूझकर मनोहर से करवाती थी। उनका मानना था कि मनोहर बड़ा बेटा है तो उसकी जिम्मेदारी ज्यादा है। जबकि मनोहर का तो पूरा परिवार है, दो बच्चे हैं। महेश का परिवार तो अभी कहां बड़ा है, सिर्फ एक पत्नी ही तो है।

और फिर मनोहर की तो खुद की दुकान है। जबकि महेश को तो किसी और की यहां नौकरी बजानी पड़ती है। तो उसे ज्यादा काम करना पड़ता है। यहां तक की कोई भी काम हो वो मनोहर को ही कहती थी क्योंकि महेश तो हमेशा यही रोना रोता था, ” आज तो सेठ जी ने बहुत काम करवाया है। मैं तो थक गया हूं। शरीर में जान ही नहीं बची है। सचमुच किसी के यहां नौकरी करना इतना आसान नहीं होता है। जान निकाल लेते हैं आपकी” चाहे उसके बाद वो पूरा समय व्यर्थ करता रहे या अपनी पत्नी के साथ घूमने चले जाए।

विम्मी का ससुराल भी यही पास में ही था और एक संयुक्त परिवार था। आए दिन उसके यहां कोई ना कोई प्रोग्राम लगा ही रहता था। अब अगले महीने ननद की शादी है। जिसमें इन लोगों को भी पहरावनी के कपड़े देने थे। बस तब से अम्मा मनोहर के पीछे पड़ी है कि वो विम्मी के ससुराल जाए और वहां से पहरावनी की पर्ची तैयार करवा कर लाये। पर मनोहर को वक्त ही नहीं मिल रहा था।

अम्मा जी की बड़ी अजीब सी आदत थी। जब भी मनोहर खाना खाने बैठता उसी समय ये सब बातें शुरू करती। जिसे सुन सुनकर मनोहर खाना खाते-खाते बीच में ही उठ जाता। लेकिन अम्माजी थी कि चुप ही नहीं होती। ढंग से खाना ना खाने के कारण मनोहर को बीपी शुगर की बिमारी भी लग चुकी थी।

मालती का कई बार मन करता कि अम्मा जी को पलट कर जवाब दे दे, पर कहे क्या। हर बार मनोहर मना कर देता। क्योंकि अम्मा जी उसके बाद तीन-चार दिन तक इस बात को पकड़ कर घर में हंगामा करती रहती। अब सब तो अपने अपने कामों से निकल जाते थे लेकिन मालती को तो घर पर ही रहना होता था। घर मालती अपना काम खत्म कर कमरे में आकर सो गई।

दूसरे दिन सुबह भी रोज की तरह ही चल रहा था। तभी मनोहर नाश्ता करने बैठा। तब फिर अम्मा ने कहा, “मनोहर आज तो कैसे भी करके विम्मी के ससुराल से पर्ची ले ही आना। काम को आगे तक मत डालो। बाद में भागते फिरोगे”

” अम्मा मैंने आपको कहा ना कि मुझे बिल्कुल वक्त नहीं मिल पा रहा है। नहीं तो मैं खुद ही उसके ससुराल चला जाता। कभी मना थोड़ी ना किया है आपको”…..” कभी मना नहीं किया है, लेकिन अभी तो मना कर रहा है। तू बड़ा भाई है, तू नहीं जाएगा तो कौन जाएगा? और ऐसा कौन सा काम कर रहा है जो तुझे वक्त ही नहीं मिल रहा है। तेरी तो खुद की दुकान है। जब चाहे बंद कर, और चला जा। किसी के यहां नौकरी थोड़ी ना कर रहा है”

” अम्मा इस बार महेश को भेज दो। महेश वर्कशॉप से जब आता है तो विम्मी का ससुराल रास्ते में ही पड़ता है। आते समय वहां से पर्ची ले आएगा। जबकि मुझे तो जानबूझकर दुकान बंद करके वहां जाना पड़ेगा। कोई दुकान में लड़का थोड़ी ना काम करता है। अम्मा वैसे ही ब्रिज बनने के कारण दुकान नुकसान में जा रही है। ऐसे में हर बार दुकान बंद करके जाऊंगा तो भला मेरे पास कोई क्यों सामान लेने आएगा। मेरे जैसी दस दुकानें मौजूद है बाजार में “

मनोहर ने अपनी बेबसी जताते हुए कहा और नाश्ता करने लगा।

” हां, सही है। बहन के यहां जाते ही रोना आता है। तेरे ससुराल में कोई काम होता तो फट से चला जाता। तब तो दुकान भी बंद हो जाती और कोई फर्क नहीं पड़ता”

अम्मा ने अपना बढ़ बढ़ाना शुरू कर दिया। मनोहर ने जैसे तैसे एक दो चम्मच पोहे के निगले और उठकर रवाना हो गया। लेकिन अम्मा तो अभी भी बड़बड़ाए जा रही थी। उन्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ा कि मनोहर ने नाश्ता ठीक से किया है या नहीं। मालती ये सब देख रही थी। अब उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। वो आकर अम्मा जी को बोली, “अम्मा जी कम से कम उन्हें नाश्ता या खाना तो ढंग से खा लेने दिया करो। हमेशा उसी समय क्यों बोलती हो जब वो कुछ खा रहे होते हैं। फिर आप तो सिर्फ बड़ बढ़ाने से मतलब रखती हो। आपको तो ये भी फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने पेट भर खाना खाया है कि नहीं। आपने तो मुझसे ज्यादा उम्र देखी है। अम्मा हूं उनकी, फिर भी खाने के साथ टेंशन क्यों खिलाती हो”

मालती की बात सुनकर अम्मा को गुस्सा आ गया, ” हां, मैं तो दुश्मन हूं उसकी। तू ही उसे यहां पाल पोस कर गई थी। अब तू मुझे सुनाएगी। मैं अपने बेटे से बात भी नहीं कर सकती क्या”….” अम्मा जी बात करने में और सुनाने में फर्क होता है। आप खुद नोटिस कीजिए आप हमेशा खाना खाते समय ही ये सब बातें बोलते हो। एक और बेटा भी तो है आपका। उसको क्यों नहीं बोलती हो?”

” अब तू मुझे मेरे बेटे गिनाएगी। मेरी मर्जी। मैं किस बेटे से क्या काम करवाऊं। तू होती कौन है मुझे बोलने वाली”….” हां, वैसे मुझे हक नहीं है आपको ये सब बोलने का। लेकिन मेरा पति अक्सर भूखा उठता है तो मुझे परेशानी होती है। अगर कल को उन्हें कुछ हो जाएगा ना, तो आपके पास तो दूसरा बेटा मौजूद है। पर मेरे पास कोई दूसरा पति नहीं है। अभी समझना है तो समझिए, वरना अलग कर दीजिए। रोज-रोज के क्लेश से तो एक बार का क्लेश अच्छा”

अम्मा और मालती के बीच की बहस सुनकर महेश और उसकी पत्नी ममता भी बाहर आ गए। महेश ने आते से ही कहा, ” भाभी आपको शर्म नहीं आ रही अम्मा से बहस करते हुए। आप घर के दो टुकड़े करने में क्यों तुली हो”

” जब जिम्मेदारी एक पर ही डाली जाती है ना, तब बोलना पड़ता है। तुम्हारा भाई हर रोज बीपी शुगर की दवाइयां खाता है।‌ ये जानने के बाद भी अम्मा जी उसे क्या खिलाती है – खाने के साथ टेंशन। आप लोगों को नहीं दिखता कि वो कितना परेशान रहते हैं”

मालती की बात सुनकर ममता बीच में ही बोली, ” अरे भाभी जी तो खुद अलग होना चाहती है। बेवजह भैया के कंधों पर बात रखकर बोल रही है”

“तुम्हें जो समझना है समझो। पर अब हमें अलग होना है। अपनी अपनी जिम्मेदारियां अपने आप उठाओ”

कहकर मालती अपने कमरे में चली गई। आखिरकार काफी क्लेश के बाद मनोहर ने भी इस बात का समर्थन किया तो अम्मा को मजबूरन दोनों बेटों का अलग-अलग करना पड़ा। अम्मा जी छोटे बेटे बहू के साथ ही रही। अब अपने सिर पर जिम्मेदारी पड़ी तो अपने आप ही महेश और ममता को भी बात समझ में आ गई कि  पांच हजार रुपए में गृहस्थी नहीं चलती। वही अम्मा जी को भी समझ में आ गया कि बड़े बेटा बहू वाकई उनकी खूब सेवा करता था।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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