प्रभु जगन्नाथ
ओडिशा के पवित्र नगर पुरी में, जहाँ समुद्र की लहरें भी मानो “जय जगन्नाथ” का जाप करती थीं, वहीं भगवान जगन्नाथ का विशाल मंदिर करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र था। हर सुबह मंदिर की घंटियाँ बजते ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती। कोई आँखों में आँसू लिए प्रभु से प्रार्थना करता, तो कोई महाप्रसाद पाकर स्वयं को धन्य समझता। पूरे नगर में भक्ति, सेवा और विश्वास का वातावरण था। लेकिन उसी पुरी में एक ऐसा व्यक्ति भी रहता था, जिसके हृदय में धन का घमंड भगवान से भी बड़ा हो चुका था।
उसका नाम था धनंजय सेठ। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। सोने-चाँदी से भरे खजाने, अनाज से लबालब गोदाम, नौकर-चाकरों से भरी हवेली और समुद्र में चलते उसके विशाल व्यापारिक जहाज़—सब कुछ उसके पास था। लोग उसे सफल कहते थे, लेकिन सफलता के साथ उसका अहंकार भी आसमान छूने लगा था। वह अक्सर कहा करता, “दुनिया में धन से बड़ा कोई देवता नहीं। मेहनत और पैसा ही इंसान की असली ताकत है।”
एक दिन उसके कर्मचारियों ने विनम्रता से कहा, “सेठ जी, रथयात्रा का शुभ समय आ गया है। पूरा नगर भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए जा रहा है। यदि आप भी चलें तो बड़ा पुण्य मिलेगा।”
धनंजय व्यंग्य से हँस पड़ा। उसने कहा, “दर्शन से व्यापार नहीं चलता। पत्थर की मूर्तियाँ किसी की किस्मत नहीं बदलतीं। धन कमाना ही सबसे बड़ा धर्म है।”
उसकी बात सुनकर सभी कर्मचारी चुप हो गए। उसी समय वहाँ से मंदिर के एक वृद्ध पुजारी गुज़रे। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “बेटा, धन से सुख खरीदा जा सकता है, लेकिन शांति नहीं। अहंकार मनुष्य को बाहर से नहीं, भीतर से निर्धन बना देता है।”
धनंजय मुस्कराया और बोला, “अगर आपके भगवान में इतनी शक्ति है, तो वे स्वयं आकर मुझे समझा दें।”
पुजारी ने उसकी ओर करुणा से देखा और बोले, “कभी-कभी भगवान दंड देने नहीं, बदलने आते हैं। लेकिन जब वे आते हैं, तब मनुष्य का जीवन पहले जैसा नहीं रहता।”
धनंजय ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और अपनी हवेली लौट गया। उसे क्या पता था कि उसके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा अब आरंभ होने वाली है।
उस रात समुद्र की ठंडी हवाएँ बह रही थीं। नगर शांत था। तभी उसकी हवेली के मुख्य द्वार पर किसी ने धीरे से दस्तक दी। सेवक ने द्वार खोला तो सामने एक साधारण वस्त्र पहने वृद्ध यात्री खड़े थे। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज था, लेकिन वेश बिल्कुल सामान्य।
उन्होंने विनम्रता से कहा, “बेटा, कई दिनों से यात्रा पर हूँ। बहुत भूखा हूँ। यदि थोड़ा भोजन और रातभर विश्राम करने की जगह मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”
इतने में धनंजय स्वयं वहाँ आ पहुँचा। उसने वृद्ध को ऊपर से नीचे तक देखा और कठोर स्वर में बोला, “यह कोई धर्मशाला नहीं है। जाओ, मंदिर में माँग लो। लोग कहते हैं तुम्हारा भगवान सबकी सहायता करता है।”
वृद्ध ने शांत मुस्कान के साथ कहा, “याद रखना बेटा… जो दूसरों के लिए अपना द्वार बंद कर देता है, उसके लिए भाग्य के द्वार भी एक दिन बंद हो जाते हैं।”
इतना कहकर वे धीरे-धीरे अंधेरे में चले गए। धनंजय ने उपहास करते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया।
अगली ही सुबह उसके जीवन में पहला आघात आया। बंदरगाह से समाचार मिला कि उसका सबसे बड़ा व्यापारिक जहाज़ समुद्र में आए भीषण तूफ़ान में डूब गया। लाखों की संपत्ति एक ही रात में समाप्त हो गई।
वह अभी इस आघात से उबर भी नहीं पाया था कि दूसरा कर्मचारी दौड़ता हुआ आया। “सेठ जी! दक्षिण वाले गोदाम में आग लग गई है। पूरा अनाज जलकर राख हो गया।”
धनंजय तुरंत वहाँ पहुँचा। आग इतनी भयंकर थी कि देखते ही देखते वर्षों की कमाई धुएँ में बदल गई।
फिर भी उसका घमंड पूरी तरह नहीं टूटा। उसने स्वयं को समझाया, “धन गया है, फिर आ जाएगा।”
लेकिन भगवान की लीला अभी पूरी कहाँ हुई थी।
कुछ ही दिनों में उसके व्यापारिक साझेदार उससे दूर होने लगे। जिन लोगों ने कभी उसकी प्रशंसा की थी, वही लोग अब मुँह फेरने लगे। बाज़ार में उसकी साख गिर गई। कर्ज़ बढ़ने लगा।
और तभी सबसे बड़ा आघात आया।
उसकी इकलौती बेटी गौरी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। बड़े-बड़े वैद्य बुलाए गए, दुर्लभ औषधियाँ मँगाई गईं, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। अंत में वैद्य ने निराश होकर कहा, “अब इसकी रक्षा केवल भगवान ही कर सकते हैं।”
उस रात गौरी ने कमजोर आवाज़ में पूछा, “पिताजी… क्या भगवान जगन्नाथ सचमुच सबकी सुनते हैं?”
धनंजय के पास कोई उत्तर नहीं था।
कुछ देर बाद उसने फिर पूछा, “अगर वे सबकी सुनते हैं… तो क्या मेरी भी सुनेंगे?”
यह सुनकर पहली बार धनंजय का कठोर हृदय टूट गया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वर्षों बाद वह अपने घर के मंदिर में गया। वहाँ रखा दीपक स्वयं अपने हाथों से जलाया और काँपती आवाज़ में बोला—”प्रभु… यदि आप सचमुच हैं… तो मेरी बेटी को बचा लीजिए। मैंने जीवन भर आपका अपमान किया। मुझे मेरे अपराधों का दंड दीजिए, लेकिन मेरी बेटी को जीवन दे दीजिए।”
उसी क्षण बिना हवा के दीपक की लौ तेज़ हो उठी। पूरे कक्ष में चंदन की दिव्य सुगंध फैल गई। मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगी।
धनंजय ने आश्चर्य से चारों ओर देखा।
तभी उसे वही परिचित करुणामयी आवाज़ सुनाई दी—जिस हृदय में सच्चा पश्चाताप जन्म ले लेता है, वहाँ मेरी कृपा का द्वार स्वयं खुल जाता है।”
अगली सुबह वह अपनी बेटी को लेकर भगवान जगन्नाथ के मंदिर पहुँचा। मंदिर में आरती चल रही थी। शंख और घंटियों की ध्वनि वातावरण को अलौकिक बना रही थी।
वहीं उसे वही वृद्ध पुजारी मिले।
उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, “बेटा, अब तुम्हारी आँखों में घमंड नहीं दिखाई देता।”
धनंजय रो पड़ा। उसने सारी घटना सुनाई और पूछा, “वह वृद्ध यात्री कौन थे?”
पुजारी ने भगवान जगन्नाथ की विशाल आँखों की ओर संकेत करते हुए कहा, “कभी-कभी प्रभु अपने भक्तों की परीक्षा लेने नहीं, उनका अहंकार तोड़ने साधारण मनुष्य का रूप धारण करते हैं।”
धनंजय ने जैसे ही भगवान की ओर देखा, उसे वही मुस्कान, वही करुणा और वही दृष्टि दिखाई दी, जो उस वृद्ध यात्री के चेहरे पर थी।
वह फूट-फूटकर रो पड़ा।
“प्रभु… उस दिन मेरे द्वार पर आप स्वयं आए थे… और मैं आपको पहचान नहीं सका।”
उसी समय उसकी बेटी गौरी, जो कई दिनों से बिस्तर पर थी, धीरे-धीरे उठकर अपने पैरों पर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
वैद्य आश्चर्यचकित रह गए।
पुजारी ने केवल इतना कहा, “जहाँ मनुष्य की शक्ति समाप्त होती है, वहीं से ईश्वर की कृपा प्रारंभ होती है।”
उस दिन के बाद धनंजय का जीवन पूरी तरह बदल गया।
उसने अपने गोदाम गरीबों के लिए खोल दिए। प्रतिदिन महाप्रसाद वितरण करवाने लगा। यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ बनवाईं। अनाथ बच्चों की शिक्षा का भार उठाया। और सबसे पहले उसने अपने घर का मुख्य द्वार हमेशा के लिए खुला रखने का आदेश दिया।
वर्षों बाद लोग उसे उसके धन से नहीं, उसकी सेवा और विनम्रता से पहचानने लगे।
जब भी कोई भूखा, असहाय या थका हुआ यात्री उसके द्वार पर आता, वह स्वयं बाहर निकलकर उसका स्वागत करता। क्योंकि उसके मन में हमेशा एक ही विचार रहता—
“कहीं इस बार मेरे द्वार पर फिर से स्वयं प्रभु जगन्नाथ तो नहीं आए हैं?”
इस कथा का संदेश आज भी उतना ही सत्य है जितना उस समय था। भगवान को सोना-चाँदी, महल और वैभव नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए केवल निष्कपट प्रेम, विनम्रता और सच्ची भक्ति। जो अपने अहंकार को छोड़कर सच्चे मन से उनके चरणों में झुक जाता है, उसके लिए प्रभु कृपा के ऐसे द्वार खोल देते हैं, जिन्हें संसार की कोई शक्ति बंद नहीं कर सकती।
जय जगन्नाथ।
जय श्री राम