lalittripathi@rediffmail.com
Quotes

नौकरी, हमारा पूरा जीवन नहीं है

66Views

नौकरी, हमारा पूरा जीवन नहीं है

राघव हर सुबह सबसे पहले ऑफिस पहुँचता था और सबसे आख़िर में निकलता था। उसे लगता था कि जितना ज़्यादा समय वह काम को देगा, उतना ही सफल होगा। धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी का हर रिश्ता “बाद में” के लिए टलता गया।

माँ का फोन आता तो वह कहता, “अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।”

बेटी हर शाम दरवाज़े पर उसका इंतज़ार करती, लेकिन जब तक वह घर पहुँचता, वह सो चुकी होती।

पत्नी कई बार साथ बैठकर चाय पीने की बात करती, मगर उसके पास हमेशा एक ही जवाब होता—”बस यह काम खत्म कर लूँ।”

फिर एक दिन अचानक राघव बीमार पड़ गया। कई दिनों तक वह ऑफिस नहीं जा सका। उसे लगा कि उसके बिना शायद सब रुक जाएगा।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ऑफिस चलता रहा। मीटिंग्स होती रहीं। उसकी कुर्सी पर किसी और ने काम संभाल लिया। कुछ दिनों बाद लोगों ने उसकी कमी महसूस करना भी छोड़ दिया।

लेकिन घर…माँ की आँखों में चिंता थी। बेटी हर पल उसके पास बैठी रहती। पत्नी बिना कुछ कहे उसकी देखभाल करती रही।

उसी दौरान राघव को एहसास हुआ कि जिस नौकरी के लिए वह अपनों से दूर होता गया, वह नौकरी उसके बिना भी चलती रही। मगर जिन लोगों को वह समय नहीं दे पाया, उनके लिए उसकी मौजूदगी ही सबसे बड़ी दौलत थी।

उस दिन उसने खुद से एक वादा किया—

  • अब दोपहर का खाना समय पर खाऊँगा।
  • काम के बाद खुद को और अपने परिवार को समय दूँगा।
  • वीकेंड सिर्फ़ ऑफिस के लिए नहीं, अपने लोगों के लिए भी होगा।
  • ज़रूरत पड़े तो बिना अपराधबोध के छुट्टी लूँगा, और बीमार होने पर आराम करूँगा। क्योंकि मैंने अपनी मेहनत के बदले वेतन और सुविधाएँ स्वीकार की हैं…
  • अपनी आत्मा, अपनी खुशियाँ और अपना पूरा जीवन नहीं।

आख़िर में राघव मुस्कुराया और अपनी बेटी का हाथ पकड़कर बोला—”नौकरी केवल वेतन देती है… लेकिन जीने की वजह तो अपना परिवार और अपने लोग ही देते हैं।”

याद रखिए—नौकरी ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी आपका जीवन है। क्योंकि अगर आप ही नहीं रहेंगे, तो न नौकरी मायने रखेगी, न कमाई।

कहानी अच्छी लगे तो Like और Comment जरुर करें। यदि पोस्ट पसन्द आये तो Follow & Share अवश्य करें ।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

Leave a Reply