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बर्फ का टुकड़ा, रिश्तों की गर्माहट

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बर्फ का टुकड़ा, रिश्तों की गर्माहट

नगर के एक शांत मोहल्ले में किशोरी देवी अपने बेटे और बहू प्रमिला के साथ रहती थीं। किशोरी देवी का स्वभाव बहुत सरल और दयालु था। वे मानती थीं कि पड़ोसी केवल आसपास रहने वाले लोग नहीं होते, बल्कि सुख-दुःख के साथी भी होते हैं।

एक दिन दोपहर की तेज गर्मी में प्रमिला रसोई का काम निपटा रही थी। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने बाहर जाकर देखा तो सामने पड़ोस में नए किराए पर रहने आईं सरला जी खड़ी थीं।

सरला जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटी, आज कई दिनों बाद अमरस बनाया है। थोड़ी सी बर्फ मिल जाती तो स्वाद और बढ़ जाता। क्या तुम थोड़ी बर्फ दे सकती हो?”

प्रमिला कुछ पल सोचती रही। उसे अपनी माँ की बात याद आ गई, जो अक्सर कहती थीं, “पड़ोसियों को मांगने पर कुछ मत देना। एक बार आदत पड़ गई तो बार-बार आते रहेंगे।”

इसी सोच के कारण प्रमिला ने विनम्रता से मना कर दिया और कहा, “माफ़ कीजिए आंटी, हमारे पास अतिरिक्त बर्फ नहीं है।”

सरला जी हल्की मुस्कान के साथ लौट गईं, लेकिन उनके चेहरे पर निराशा साफ दिखाई दे रही थी। कुछ देर बाद किशोरी देवी ने पूछा, “बहू, कौन आया था?”

प्रमिला ने सारी बात बता दी और साथ ही अपनी माँ की सीख भी सुना दी।

किशोरी देवी गंभीर हो गईं। उन्होंने प्रेम से कहा, “प्रमिला, तुमने ठीक नहीं किया। मांगने वही आता है जिसे किसी चीज़ की आवश्यकता होती है। देने वाला वही बन सकता है जिसके पास कुछ अतिरिक्त हो। यदि हमारे पास है और फिर भी हम किसी की छोटी-सी मदद न करें, तो हमारे होने का क्या लाभ?”

प्रमिला चुपचाप सुनती रही।

किशोरी देवी ने आगे कहा, “जब तुम्हारे पति छोटे थे, तब हमारे घर में फ्रिज नहीं था। गर्मियों में बच्चे ठंडा पानी पीने की जिद करते थे। मैं भी पड़ोसियों के घर थोड़ी बर्फ मांगने जाती थी। जब कोई दे देता था तो मन खुश हो जाता था, और जब कोई मना कर देता था तो बहुत दुःख होता था। इसलिए मैंने हमेशा याद रखा कि यदि किसी को मेरी छोटी-सी मदद से खुशी मिल सकती है, तो मुझे कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।”

फिर उन्होंने कहा, “जाओ, फ्रिज से बर्फ निकालो और सरला जी को देकर आओ। उनसे कहना कि अभी-अभी जमाई है।”

प्रमिला को अपनी गलती का एहसास होने लगा। वह तुरंत बर्फ लेकर सरला जी के घर पहुँची। सरला जी ने मुस्कुराकर धन्यवाद कहा। साथ ही एक कटोरी अमरस भी उसे चखने के लिए दे दिया।

शाम को जब प्रमिला घर लौटी तो उसके चेहरे पर संतोष था। उसने किशोरी देवी से कहा, “मम्मीजी, आज समझ में आया कि छोटी-सी सहायता भी किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है।”

किशोरी देवी मुस्कुराईं और बोलीं, “बेटी, रिश्ते बड़े उपहारों से नहीं, छोटी-छोटी मददों और अपनापन दिखाने से बनते हैं।”

उस दिन के बाद प्रमिला का व्यवहार बदल गया। वह पड़ोसियों की सहायता करने लगी और जल्द ही पूरे मोहल्ले में उसकी पहचान एक मिलनसार और सहृदय बहू के रूप में होने लगी।

शिक्षा: संपत्ति की असली कीमत उसके संग्रह में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग में होती है। छोटी-सी मदद भी रिश्तों में बड़ी गर्माहट भर देती है।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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