अतिथि देवो भव
एक छोटे से गाँव में एक गरीब माँ अपने छोटे बच्चे के साथ रहती थी। गरीबी जरूर थी, लेकिन माँ ने अपने बच्चे को बचपन से ही एक बात सिखाई थी— “बेटा, हमारे यहाँ अतिथि को भगवान का रूप माना जाता है…जो भी हमारे द्वार पर आए, उसे खाली हाथ नहीं जाने देना।”
एक बार पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी माँ बड़ी मुश्किल से चार रोटियों का इंतज़ाम ही कर पाई। रात को दोनों माँ-बेटा खाना खाने बैठे ही थे कि दरवाज़े पर दस्तक हुई…दरवाज़ा खोला तो एक बूढ़ा आदमी खड़ा था—
थका हुआ, कमजोर और बेहद लाचार सा…
वह धीमी आवाज़ में बोला—
“बेटी… दो दिन से भूखा हूँ… अगर कुछ मिल जाए तो…”
माँ एक पल के लिए रुकी…
उसने रोटियों की तरफ देखा…फिर बिना कुछ सोचे उसने दो रोटियाँ उस बूढ़े को दे दीं
बूढ़े ने काँपते हाथों से रोटियाँ लीं…उसकी आँखों में आँसू आ गए— “बेटी, आज तूने मुझे सिर्फ रोटी नहीं दी…बल्कि जीवन दे दिया है..भगवान तुझे खुश रखे…”
माँ ने मुस्कुराकर प्रणाम किया व आशीर्वाद लेकर वृद्ध को विदा किया।
बच्चा यह सब देख रहा था…
उसने बिना कुछ कहे अपनी रोटी उठाई एक खुद ली और एक मां की थाली में रख दी तथा खुशी-खुशी खाने लगा।
उस रात माँ और बच्चे ने एक-एक ही रोटी खाई…लेकिन उनके दिल संतोष और खुशी से भरे हुए थे।
माँ ने प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—“बेटा, याद रखना… जब हम किसी भूखे को खाना खिलाते हैं, जरूरतमंद की सहायता करते हैं , अतिथि का सत्कार करते हैं तो भगवान हमारे घर से कभी भी खुशियां नहीं जाने देते…”
समय बीतता गया…धीरे-धीरे उनके जीवन में बदलाव आने लगा…काम बढ़ने लगा, घर में सुख-समृद्धि आने लगी।
एक दिन वही छोटा सा घर खुशियों और संपन्नता से भर गया…तब माँ ने मुस्कुराकर कहा—
“देखा बेटा…अतिथि देवो भव का पालन कभी व्यर्थ नहीं जाता…”
*शिक्षा-अतिथि देवो भव” केवल शब्द नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और सच्ची इंसानियत का प्रतीक है।
जो दिल से बाँटता है,
उसके जीवन में कभी कमी नहीं रहती। नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती…वह किसी न किसी रूप में लौटकर जरूर आती है…
जय श्री राम