नोटिस गल गयी
दो भाई थे, दोनों भाइयों में बहुत प्रेम था। उनकी कपड़े की दूकान थी। दोनों भाई उस दूकान पर बैठते और घर में भी एक साथ प्रेम से रहते।
भाइयों की पत्नियों में थोड़ा-बहुत विवाद हो भी जाता, तो वे इसकी परवाह न करते। धीरे-धीरे पत्नियों का झगड़ा बढ़ता चला गया। छोटे भाई को लगा, इस रोज-रोज के झगड़े से तो अच्छा है कि अलग ही रहे।
उसने बड़े भाईसे कहा, ‘भैया ! हम लोग अलग हो जायें तो अच्छा।’ बड़े भाई ने सुना और हँसकर टाल दिया। कुछ दिनों बाद पत्नी ने फिर कान भरे। छोटा भाई इस बार बड़े भाई के सामने खड़ा हो गया, ‘भैया! ऐसे टालने से नहीं चलेगा। मुझे मकान और दूकान में से मेरा हिस्सा दे दो।’ बड़ा भाई यह सुनकर बोला, ‘ठीक है, तुम नहीं मानते तो यही सही। लेकिन आज तो मुझे दूसरा काम है। हम कल इस पर विचार करेंगे।’
छोटा भाई यह सुनकर चुप हो गया और दूकान चला गया। लेकिन उसका मन नहीं लग रहा था। वह बड़े भाई से कहकर दूकान से उठकर बाहर चला गया। इस समय वह घर भी जाना नहीं चाहता था। तभी सामने लगे एक बैनर पर उसका ध्यान गया। देखा एक सन्त आये हैं, तीन दिन से रामकथा चल रही है। आज चौथा दिन है। वह अन्यमनस्क-सा रामकथा सुनने चला गया। पण्डाल में बहुत भीड़ थी। वह बाहर बैठकर ही कथा सुनने लगा। कथा में श्रीराम के वनवास का प्रसंग चल रहा था। श्रीराम-लक्ष्मण-सीता के वन चले जाने के बाद भरत ननिहाल से आते हैं। वे पिता दशरथ का अन्तिम संस्कार करते हैं। इसके पश्चात् माता कौसल्या और गुरु वसिष्ठ उन्हें समझा रहे हैं-‘ भरत, पिता के दिये वचनों के अनुसार अयोध्या का राज्य तुम्हें मिला है। अब तुम्हें राजपद ग्रहण करके यहाँ का राजकाज सँभालना चाहिये।’ लेकिन भरत इसके लिये तैयार नहीं हैं। वे रो-रोकर गुरुदेव से निवेदन कर रहे हैं-‘हे देव! मैं तो पहले ही माता के अपराध का बोझ ढो रहा हूँ। बड़े भैया श्रीरामका अधिकार मैं कैसे भोग सकता हूँ ? मैं उनका अधिकार उनको सौंपने के लिये वन जाऊँगा और उन्हें मनाकर ले आऊँगा। भैया राम की जगह मैं स्वयं जन्म भर के लिये वन चला जाऊँगा।’
छोटा भाई बड़ी तन्मयता से यह प्रसंग सुन रहा था। भरत के वचन सुनकर सहसा उसकी आत्मा के ताय झनझना उठे। वह जैसे सोते से जाग पड़ा। अरे, हमारे देश की परम्परा तो ऐसे भ्रातृ-प्रेम की है और एक मैं हूँ, जो रोज बड़े भाई से सम्पत्ति का हक माँगकर झगड़ा करता हूँ, अलग होने की बात करता हूँ। धिक्कार है मुझे !
वह उठा, सीधा दौड़कर जा पहुंचा दूकान और भैया के पैरों पर सिर रखकर आँसू बहाने लगा। बड़े भैया य देखकर हैरान कि अचानक यह छोटे को क्या हो गया? उन्होंने उसे उठाया और हृदय से लगा लिया। उन्होंने देख छोटे के हाथ में एक फटा हुआ कागज है। वह कागज बँटवारे की नोटिस थी, जो उसने पिछली रात किसी वकील तैयार करवायी थी, बड़े भाई को देने के लिये, जो अब आँसुओं में भींगकर गल चुकी थी
जय श्री राम