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मायका

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मायका

एक दिन पति से झगड़ा हुआ तो मैंने अपने दिल की सारी बातें अपने भाई को बता दीं। मेरी बातें सुनकर भाई ने प्यार से कहा, “तुम कुछ दिनों के लिए मेरे घर आ जाओ। जब तुम दोनों एक-दूसरे से दूर रहोगे, तो एक-दूसरे का महत्व समझोगे।”

भाई की बात मानकर मैं कुछ दिनों के लिए अपना ससुराल छोड़कर मायके आ गई।

मेरा भाई बहुत अच्छा है। वह मुझसे बेहद प्यार करता है, मेरी परवाह करता है। लेकिन कहते हैं न, रिश्ते चाहे कितने भी अपने हों, घर में सबकी अपनी-अपनी जगह और अपनी-अपनी मजबूरियाँ होती हैं।

शुरुआत में सब ठीक था, लेकिन कुछ दिनों बाद भाभी को लगने लगा कि कहीं मैं हमेशा के लिए यहीं न रह जाऊँ। फिर वह दूसरों की आड़ लेकर मुझे रोज़ कुछ न कुछ सुनाने लगीं।

कभी कहतीं, “आजकल की लड़कियाँ छोटी-छोटी बातों पर घर छोड़ देती हैं।”

तो कभी ताना मारतीं, “जो लड़कियाँ अपना घर छोड़ देती हैं, उनका फिर कोई घर नहीं रहता। न मायके की रहती हैं, न ससुराल की।”

उनकी बातें सुनकर मैं चुप रह जाती। मैं जानती थी कि मेरा भाई मुझसे प्यार करता है, लेकिन हर बार उसके सामने अपनी तकलीफ बताकर मैं उसके घर का माहौल खराब नहीं करना चाहती थी।

धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि जिस घर को मैं अपना मायका समझकर आई थी, वहाँ अब मुझे हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ता है।

कभी माँ के रहते जिस घर में मैं बेझिझक हँसती थी, अपनी मर्जी से रसोई में जाती थी, अपने मन की हर बात कह देती थी, उसी घर में अब मुझे किसी की नाराज़गी का डर सताने लगा था।

उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि घर की दीवारें वही थीं, आँगन वही था, दरवाज़े भी वही थे… मगर उस घर में मेरा बेफिक्र होकर जीने वाला बचपन कहीं खो गया था।

उधर, मेरे पति को भी मेरी कमी महसूस होने लगी थी। कुछ दिनों बाद वह मुझे लेने आ गए।

उन्हें सामने देखकर न जाने क्यों मेरा सारा गुस्सा, सारी शिकायतें और सारी नाराज़गी आँसुओं में बह निकली।

मैं उनसे लिपटकर रोने लगी।

उन्होंने मेरे आँसू पोंछे और मुझे अपने साथ घर चलने को कहा। उस पल मुझे एहसास हुआ कि रिश्तों में नाराज़गी हो सकती है, झगड़े हो सकते हैं, लेकिन अगर दोनों के दिल में एक-दूसरे के लिए प्यार बाकी हो, तो दूरियाँ भी कभी-कभी रिश्ते की अहमियत समझा देती हैं।

मैं उनके साथ वापस ससुराल लौट आई।

रास्ते भर कार की खिड़की से बाहर देखते हुए मेरे मन में बस एक ही सवाल घूमता रहा…

आखिर शादी के बाद एक बेटी का अपना घर कौन-सा होता है?

जिस घर में उसने बचपन बिताया, वहाँ अब उसे मेहमान की तरह रहना पड़ता है और जिस घर को उसने अपना बनाने के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया, वहाँ कभी-कभी उसे अपने ही अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता है।

तभी मन के किसी कोने से एक आवाज़ आई…

“शायद इसीलिए कहते हैं कि मायका माँ से ही होता है।”

क्योंकि माँ के रहते मायका सिर्फ एक घर नहीं होता, बल्कि वह जगह होती है जहाँ बेटी बिना कुछ कहे भी समझ ली जाती है। जहाँ उसकी गलतियों पर भी उसे अपनापन मिलता है। जहाँ उसे यह डर नहीं होता कि उसके रहने से किसी को परेशानी होगी।

माँ चली जाए तो मायके का पता तो वही रहता है, लेकिन उस पते पर मिलने वाला अपनापन पहले जैसा नहीं रह जाता।

और शायद यही हर एक बेटी की जिंदगी का सबसे खामोश दर्द है…

जिस घर को वह जिंदगी भर अपना समझती है, शादी के बाद उसी घर में उसे कभी-कभी अपनी जगह तलाशनी पड़ती है।

इसलिए बेटियों को सिर्फ यह मत सिखाइए कि शादी के बाद ससुराल ही उनका घर है। उन्हें यह एहसास भी दिलाते रहिए कि मायके के दरवाज़े उनके लिए हमेशा खुले हैं।

क्योंकि बेटी चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए, कितनी भी दूर चली जाए, उसके दिल में एक कोना हमेशा अपने मायके के लिए धड़कता है।

मायका सिर्फ एक घर नहीं, माँ के आँचल में मिलने वाला वह सुकून है, जिसे दुनिया का कोई दूसरा रिश्ता पूरी तरह नहीं दे सकता।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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