एक राखी, जो आखिरी निशानी बन गई
रक्षाबंधन का दिन था। बहन हर साल की तरह भाई की कलाई पर राखी बाँधने के लिए मायके आई।
भाई ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बहन, इस बार क्या चाहिए?”
बहन ने हँसकर कहा,
“कुछ नहीं… बस तू हमेशा खुश रहना।”
राखी बाँधते समय भाई की आँखें भर आईं। उसने बहन के सिर पर हाथ रखा और बोला, “तू हर साल ऐसे ही आती रहना।”
बहन मुस्कुराई और बोली,
“पागल! भाई की कलाई पर राखी बाँधने के लिए बहन को बुलाना नहीं पड़ता।”
कुछ महीनों बाद अचानक भाई का निधन हो गया।
अगले रक्षाबंधन पर बहन राखी लेकर मायके पहुँची। वही घर था, वही कमरा था… बस भाई नहीं था।
वह भाई की तस्वीर के सामने बैठी, राखी हाथ में ली और बहुत देर तक उसे देखती रही।
फिर तस्वीर पर राखी रखते हुए धीरे से बोली—“भैया… इस बार कलाई तो नहीं है, लेकिन मेरा प्यार आज भी वहीं है।”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। तभी माँ ने पीछे से आकर कहा, “बेटी, राखी बाँध दे… भाई जहाँ भी होगा, उसकी कलाई तक यह प्यार जरूर पहुँचेगा।”
बहन ने तस्वीर पर राखी बाँधी और मुस्कुराने की कोशिश की।
उस दिन उसे समझ आया-भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ एक कलाई पर बंधे धागे का नाम नहीं है।
यह वह रिश्ता है, जिसे मौत भी खत्म नहीं कर सकती। ❤️