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सत्संग की महिमा

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सत्संग की महिमा

एक बार महर्षि वसिष्ठ और विश्वामित्र में यह विवाद छिड़ा कि तपस्या बड़ी है या सत्संग। वसिष्ठजी सत्संग और विश्वामित्रजी तप के पक्ष में थे।

दोनों ब्रह्मर्षि ठहरे, उनके विवाद का निर्णय करने का साहस कोई नहीं कर सकता था। वे ब्रह्मलोक पहुँचे। परंतु ब्रह्माजी ने भी सोचा कि इनमें कोई रुष्ट होकर शाप दे देगा तो विपत्तिमें पड़ना होगा। उन्होंने कह दिया- ‘आपलोग अहिराज शेष के पास पाताल पधारें; क्योंकि सृष्टिके कार्य में व्यस्त होने के कारण मैं स्वस्थचित्त से कोई निर्णय देने में असमर्थ हूँ।’

पाताल पहुँचने पर दोनों महर्षियों की बात शेषजी ने सुन ली और बोले-‘आप में से कोई अपने प्रभाव से इस पृथ्वी को कुछ क्षण अधर में रोके रहे, तो मेरा भार कम हो और मैं स्वस्थ होकर विचार करके निर्णय दूँ।

‘मैं एक सहस्त्र वर्ष के तप का फल अर्पित करता हूँ, धरा आकाश में स्थित रहे।’ महर्षि विश्वामित्र ने हाथ में जल लेकर संकल्प किया, किंतु पृथ्वी हिली भी नहीं। ‘मैं आधी घड़ी के अपने सत्संग का पुण्य देता हूँ, पृथ्वी देवी कुछ क्षण गगन में ही अवस्थित रहें। ब्रह्मर्षि वसिष्ठजी ने संकल्प किया और पृथ्वी देवी शेषजी के फणों से ऊपर उठकर आकाश में निराधार स्थित हो गयीं।

अब निर्णय करने-कराने को कुछ रहा ही नहीं था। विश्वामित्रजी ने वसिष्ठजी के चरण पकड़ लिये-‘भगवन् ! आप सदा से महान् हैं।’

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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