रक्षाबंधन
इस बार रक्षाबंधन पर वो नहीं आ पाया। बस एक छोटा-सा लिफाफा भेजा — उसमें था एक चिट्ठी और सौ रुपये का नोट। चिट्ठी में लिखा था: “दीदी, इस बार हालात कुछ ठीक नहीं हैं। लेकिन तू मेरे लिए सिर्फ बहन नहीं, ईश्वर का रूप है। माफ़ कर देना कि कुछ खास नहीं भेज पाया।”
बहन ने चुपचाप लिफाफा खोला, नोट को माथे से लगाया और आँखें भीग गईं। बोली, “नालायक, भगवान की भक्ति में भेंट की कीमत नहीं देखी जाती।”
अगले ही दिन सुबह-सुबह भाई के घर की डोरबेल बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने उसकी दीदी खड़ी थी — बिना कोई खबर किए, बिना कोई शिकायत के।
“अरे दीदी! आप यहाँ?”
वो बस हल्के से मुस्कराई, “तेरे बिना राखी अधूरी लगती है। तू मेरा भाई है, मैं तुझे यूँ अकेला कैसे छोड़ सकती हूँ?”…
भाई के पास कहने को कुछ नहीं था। बस नजरें झुकी रहीं। वो दिन बीता, बहन ने खुद ही रसोई संभाली, घर को सजाया, और राखी भी बाँधी। फिर चलते वक्त चुपके से भाई की शर्ट की जेब में कुछ रख गई।
भाई ने देखा — बारह हजार रुपये थे। आँखें भर आईं।
“दीदी, मैंने तो कभी तेरे लिए कुछ कर ही नहीं पाया, और तू आज भी मेरे लिए सब कुछ करती जा रही है।”
बहन ने गले लगाते हुए कहा, “तू ठीक है, यही मेरी सबसे बड़ी कमाई है। तू मेरा छोटा नहीं, मेरी दुनिया है। और याद रख — कुछ बहनें माँ की तरह होती हैं, बस बिना दावा किए ममता लुटा जाती हैं।”
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जय श्रीराम

भाई बहन का रिश्ता दुनिया का सबसे पवित्र रिश्ता है, बहन द्वारा रक्षासूत्र बांधकर भाई के जीवन में खुशहाली सुख शांति की कामना करता है और भाई भी बहन को अभय दान देता है।