सुखी जीवन का मूल मंत्र– सहनशीलता
जापान के सम्राट यामातो का एक राज्य मंत्री था— ओ-चो-सान…..उसका परिवार सौहार्द्रता के लिए बड़ा प्रसिद्ध था……यद्यपि उसके परिवार में लगभग एक हज़ार सदस्य थे,,,, पर उसके बीच एकता का अटूट संबंध स्थापित था….सभी सदस्य साथ साथ रहते और साथ साथ ही खाना खाते थे…..फिर उनमें द्वेष कलह की बात ही क्या……?
ओ-चो-सान के परिवार की सौहार्द्रता की बात यामातो के कानों तक पहुंची…… सत्यता की जांच करने के लिए एक दिन वह स्वयं उस वृद्ध मंत्री के घर आ पहुंचे….स्वागत सत्कार और शिष्टाचार की साधारण रस्मे समाप्त हो जाने पर…..उन्होंने पूछा— महाशय!! मैंने आपके परिवार की एकता और मिलनसारता की कई कहानियां सुनी है…… क्या आप बताएंगे कि एक हजार से भी अधिक व्यक्तियों वाले आपके परिवार में यह सौहार्द्रता और स्नेह संबंध किस तरह बना हुआ है…..?
ओ-चो-सान वृद्धावस्था के कारण अधिक देर तक बात नहीं कर सकता था…..अतः उसने अपने पौत्र को संकेत से कलम दवात और कागज लाने के लिए कहा—- उन चीजों के आ जाने पर उसने अपने कांपते हाथों से कोई सौ शब्द लिखकर कागज सम्राट यामातो की ओर बढ़ा दिया,,,,, सम्राट ने उत्सुकता वश कागज पर नजर डाली तो वे चकित रह गए…..कागज में एक ही शब्द को सौ बार लिखा गया था…..सहनशीलता….. सहनशीलता….. सहनशीलता…..।
सम्राट को चकित और आवाक् देकर ओ-चो-सान ने अपनी कांपती हुई आवाज में कहा—- महाराज मेरे परिवार की सौहार्द्रता का रहस्य बस इसी एक शब्द में निहित है…..” सहनशीलता ” का यह महामंत्र है…..हमारे बीच एकता का धागा अब तक पिरोये हुऐ हैं….. इस महामंत्र को जितनी बार दोहराया जाए……कम ही है…..
जय श्रीराम
