सुविचार-सुन्दरकाण्ड-214
जय श्री राधे कृष्ण ….. "तव उर कुमति बसी बिपरीता, हित अनहित मानहु रिपु प्रीता, कालराति निसिचर कुल केरी, तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ।। भावार्थ:- आप के हृदय में उल्टी बुद्धि आ बसी है । इसी से आप हित...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "तव उर कुमति बसी बिपरीता, हित अनहित मानहु रिपु प्रीता, कालराति निसिचर कुल केरी, तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ।। भावार्थ:- आप के हृदय में उल्टी बुद्धि आ बसी है । इसी से आप हित...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुमति कुमति सब कें उर रहही, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ।। भावार्थ:- हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि)...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ, दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ, माल्यवंत गृह गयउ बहोरी, कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ।। भावार्थ:- (रावण ने कहा), ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं ।...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "माल्यवंत अति सचिव सयाना, तासु बचन सुनि अति सुख माना, तात अनुज तव नीति बिभूषन, सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ।। भावार्थ:- माल्यवान नाम का एक बहुत ही बुध्दिमान मंत्री था । उसने उन...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस, परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ।। भावार्थ:- हे दशशीश! मैं बार - बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा, बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा, जासु नाम त्रय ताप नसावन, सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ।। भावार्थ:- जिसे सम्पूर्ण जगत से द्रोह करने का पाप लगा है,...
जय श्री राधे कृष्ण ……. "ताहि बयरु तजि नाइअ माथा, प्रनतारति भंजन रघुनाथा, देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही, भजहु राम बिनु हेतु सनेही ।। भावार्थ:- वैर त्याग कर उन्हें मस्तक नवाइए । वे श्री रघुनाथ जी शरणागत का दु:ख नाश...
जय श्री राधे कृष्ण ……. " गो द्विज धेनु देव हितकारी, कृपा सिंधु मानुष तनुधारी, जन रंजन भंजन खल ब्राता, बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ।। भावार्थ :- उन कृपा के समुद्र भगवान ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओं का...
जय श्री राधे कृष्ण ……. " तात राम नहिं नर भूपाला, भुवनेस्वर कालहु कर काला, ब्रह्म अनामय अज भगवंता, ब्यापक अजित अनादि अनंता ।। भावार्थ:- हे तात! राम मनुष्यों के ही राजा नहीं हैं, वे समस्त लोकों के स्वामी और...
जय श्री राधे कृष्ण ……. " काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ, सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ।। भावार्थ:- हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ - ये सब नरक के रास्ते हैं । इन...