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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-127

जय श्री राधे कृष्ण ……. "मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान, भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ।। भावार्थ:- मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञान जनित), बहुत पीड़ा देने वाले, तम रूप अभिमान का त्याग कर दो और...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-126

जय श्री राधे कृष्ण ……. "सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी, बिमुख राम त्राता नहिं कोपी, संकर सहस बिष्नु आज तोही, सकहिं न राखि राम कर द्रोही ।। भावार्थ:- हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा कर के कहता हूँ कि राम विमुख...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-125

जय श्री राधे कृष्ण ……. "राम बिमुख संपति प्रभुताई, जाइ रही पाई बिनु पाई, सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं, बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं ।। भावार्थ:- राम विमुख पुरुष की संपत्ति और प्रभुता रही हुईं भी चली जाती है और...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-124

जय श्री राधे कृष्ण ……. "राम नाम बिनु गिरा न सोहा, देखु बिचारि त्यागि मद मोहा, बसन हीन नहिं सोह सुरारी, सब भूषन भूषित बर नारी ।। भावार्थ:- राम नाम के बिना वाणी शोभा नही पाती, मद-मोह को छोड़ विचार...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-123

जय श्री राधे कृष्ण ……. "राम चरण पंकज उर धरहू, लंका अचल राजु तुम्ह करहू, रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका, तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ।। भावार्थ:- तुम श्री राम जी के चरण कमलों को हृदय में धारण करो...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-122

जय श्री राधे कृष्ण ……. "प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि, गए सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ।। भावार्थ:- खर के शत्रु श्री रघुनाथ जी शरणागतों के रक्षक और दया के समुद्र हैं । शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-121

जय श्री राधे कृष्ण ……. "जाकें डर अति काल डेराई, जो सुर असुर चराचर खाई, तासों बयरु कबहुं नहिं कीजै, मोरे कहें जानकी दीजै ।। भावार्थ:- जो देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल भी जिनके...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-120

जय श्री राधे कृष्ण ……. "बिनती करउँ जोरि कर रावन, सुनहु मान तजि मोर सिखावन, देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी, भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ।। भावार्थ:- हे रावण! मैं हाथ जोड़ कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-119

जय श्री राधे कृष्ण ……. "जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे, तेहि पर बांधेउ तनय तुम्हारे, मोहि न कछु बांधे कइ लाजा, कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ।। भावार्थ:- तब जिन्होंने मुझे मारा, उन को मैंने भी मारा ।...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-118

जय श्री राधे कृष्ण ……. "खायउँ फल प्रभु लागी भूंखा, कपि स्वभाव तें तोरेउँ रूखा, सब के देह परम प्रिय स्वामी, मारहिं मोहि कुमारग गामी ।। भावार्थ:- हे (राक्षसों के) स्वामी ! मुझे भूख लगी थी, (इसलिए) मैंने फल खाए...

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