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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-311

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तव प्रेरित मायाँ उपजाए, सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए, प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई, सो तेहि भांति रहें सुख लहई ।। भावार्थ:- आप की प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-310

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे, छमहु नाथ सब अवगुन मेरे, गगन समीर अनल जल धरनी, इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ।। भावार्थ:- समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़ कर कहा- हे...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-309

जय श्री राधे कृष्ण ….. "काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच, बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ।। भावार्थ:- (काकभुशुण्डि जी कहते हैं), हे गरुड़ जी! सुनिये । चाहे कोई करोड़ों उपाय कर के सींचे,...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-308

जय श्री राधे कृष्ण ….. "मकर उरग झष गन अकुलाने, जरत जंतु जलनिधि जब जाने, कनक थार भरि मनि गन नाना, बिप्र रूप आयउ तजि माना ।। भावार्थ:- मगर, सौंप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-307

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा, यह मत लछिमन के मन भावा, संधानेउ प्रभु बिसिख कराला, उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ।। भावार्थ:- ऐसा कह कर श्री रघुनाथ जी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मण जी...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-306

जय श्री राधे कृष्ण ….. "ममता रत सन ग्यान कहानी, अति लोभी सन बिरति बखानी, क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा, ऊसर बीज बएँ फल जथा ।। भावार्थ:- ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-305

जय श्री राधे कृष्ण ….. "लछिमन बान सरासन आनू, सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू, सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती, सहज कृपन सन सुंदर नीती ।। भावार्थ:- हे लक्ष्मण ! धनुष - बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-304

जय श्री राधे कृष्ण ….. "बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ।। भावार्थ:- इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता । तब श्री राम...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-303

जय श्री राधे कृष्ण ….. "रिषि अगस्ति कीं साप भवानी, राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी, बंदि राम पद बारहिं बारा, मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ।। भावार्थ:- (शिव जी कहते हैं) हे भवानी ! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-302

जय श्री राधे कृष्ण ….. "नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ, कृपासिंधु रघुनायक जहाँ, करि प्रनामु निज कथा सुनाई, राम कृपा आपनि गति पाई ।। भावार्थ:- वह भी (विभीषण की भाँति) चरणों में सिर नवा कर वहीं चला, जहाँ कृपा...

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