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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-221

जय श्री राधे कृष्ण ….. "अस कहि चला बिभीषनु जबहीं, आयू हीन भए सब तबहीं, साधु अवग्या तुरत भवानी, कर कल्यान अखिल कै हानी ।। भावार्थ:- ऐसा कह कर विभीषण जी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयु हीन...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-220

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सचिव संग लै नभ पथ गयऊ, सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ ।। भावार्थ:- (इतना कह कर) विभीषण अपने मंत्रियों को साथ लेकर आकाश मार्ग में गए और सबको सुना कर वे ऐसा कहने लगे।। दो....

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-219

जय श्री राधे कृष्ण ….. "उमा संत कइ इहइ बड़ाई, मंद करत जो करइ भलाई, तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा, रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ।। भावार्थ:- (शिव जी कहते हैं), हे उमा, संत की यही बड़ाई (महिमा) है...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-218

जय श्री राधे कृष्ण ….. "मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती, सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती, अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा, अनुज गहे पद बारहिं बारा ।। भावार्थ:- मेरे नगर में रह कर प्रेम करता है तपस्वियों पर ।...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-217

जय श्री राधे कृष्ण ….. "जिअसि सदा सठ मोर जिआवा, रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा, कहसि न खल अस को जग माहीं, भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं ।। भावार्थ:- अरे मूर्ख ! तू जीता तो है सदा मेरा...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-216

जय श्री राधे कृष्ण ….. "बुध पुरान श्रुति संमत बानी, कही बिभीषन नीति बखानी, सुनत दसानन उठा रिसाई, खल तोहिं निकट मृत्यु अब आई ।। भावार्थ:- विभीषण ने पंडितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत (अनुमोदित) वाणी से नीति बखान कर...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-215

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार, सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ।। भावार्थ:- हे तात! मैं चरण पकड़ कर आप से भीख माँगता हूँ (विनती करता हूँ), कि आप मेरा दुलार...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-214

जय श्री राधे कृष्ण ….. "तव उर कुमति बसी बिपरीता, हित अनहित मानहु रिपु प्रीता, कालराति निसिचर कुल केरी, तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ।। भावार्थ:- आप के हृदय में उल्टी बुद्धि आ बसी है । इसी से आप हित...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-213

जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुमति कुमति सब कें उर रहही, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ।। भावार्थ:- हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि)...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-212

जय श्री राधे कृष्ण ….. "रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ, दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ, माल्यवंत गृह गयउ बहोरी, कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ।। भावार्थ:- (रावण ने कहा), ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे हैं ।...

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