सुविचार-सुन्दरकाण्ड-289
जय श्री राधे कृष्ण ….. "परम क्रोध मीजहिं सब हाथा, आयसु पै न देहिं रघुनाथा, सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला, पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला ।। भावार्थ:- सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मींजते हैं । पर श्री...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "परम क्रोध मीजहिं सब हाथा, आयसु पै न देहिं रघुनाथा, सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला, पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला ।। भावार्थ:- सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मींजते हैं । पर श्री...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "अस मैं सुना श्रवन दसकंधर, पदुम अठारह जूथप बंदर, नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं, जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं ।। भावार्थ:- हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "कपि सब सुग्रीव समाना, इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना, राम कृपा अतुलित बल तिन्हहीं, तृन समान त्रैलोकहि गनहीं ।। भावार्थ:- यह सब वानर बल में सुग्रीव के समान हैं और इनके जैसे (एक -...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि, दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ।। भावार्थ:- द्विविद, मयंद, नील, नल , अंगद , गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान ये सभी बलों की राशि...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा, सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा, अमित नाम भट कठिन कराला, अमित नाग बल बिपुल बिसाला ।। भावार्थ:- जिसने नगर को जलाया और आपके पुत्र अक्षय कुमार को मारा,...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "पूँछिहु नाथ राम कटकाई, बदन कोटि सत बरनि न जाई, नाना बरन भालु कपि धारी, बिकटानन बिसाल भयकारी ।। भावार्थ:- हे नाथ! आपने श्री राम जी की सेना पूछी, सो वह तो सौ करोड़ मुखों...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "रावन दूत हमहि सुनि काना, कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना, श्रवन नासिका काटैं लागे, राम सपथ दीन्हें हम त्यागे ।। भावार्थ:- हम रावण के दूत हैं, यह कानों से सुन कर वानरों ने हमें बाँध...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें, मानहु कहा क्रोध तजि तैसें, मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा, जातहिं राम तिलक तेहि सारा ।। भावार्थ:- (दूत ने कहा) हे नाथ ! आपने जैसे कृपा कर के पूछा है,...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर, कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ।। भावार्थ:- उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानों से मेरा सुयश सुन कर ही...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "जिन्ह के जीवन कर रखवारा, भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा, कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी, जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ।। भावार्थ:- और जिनके जीवन का रक्षक कोमल चित्त वाला बेचारा समुद्र बन गया...