सुविचार-सुन्दरकाण्ड-318
जय श्री राधे कृष्ण ….. "देखि राम बल पौरुष भारी, हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी, सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा, चरन बंदि पाथोधि सिधावा ।। भावार्थ:- श्री राम जी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित हो कर सुखी हो...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "देखि राम बल पौरुष भारी, हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी, सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा, चरन बंदि पाथोधि सिधावा ।। भावार्थ:- श्री राम जी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित हो कर सुखी हो...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "एहि सर मम उत्तर तट बासी, हतहु नाथ खल नर अघ रासी, सुनि कृपाल सागर मन पीरा, तुरतहिं हरी राम रनधीरा ।। भावार्थ:- इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई, करिहउँ बल अनुमान सहाई, एहिं बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ, जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ।। भावार्थ:- मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर अपने बल...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "नाथ नील नल कपि द्वौ भाई, लरिकाईं रिषि आसिष पाई, तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे, तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ।। भावार्थ:- (समुद्र ने कहा), हे नाथ ! नील और नल दो वानर भाई हैं।...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ, जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ।। भावार्थ:- समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुन कर कृपालु श्री राम जी ने मुस्कुरा कर कहा - हे...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई, उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई, प्रभु आग्या अपेल श्रुति गाई, करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई ।। भावार्थ:- प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी,...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं, मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं, ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी ।। भावार्थ:- प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव)...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "तव प्रेरित मायाँ उपजाए, सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए, प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई, सो तेहि भांति रहें सुख लहई ।। भावार्थ:- आप की प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे, छमहु नाथ सब अवगुन मेरे, गगन समीर अनल जल धरनी, इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ।। भावार्थ:- समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़ कर कहा- हे...
जय श्री राधे कृष्ण ….. "काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच, बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ।। भावार्थ:- (काकभुशुण्डि जी कहते हैं), हे गरुड़ जी! सुनिये । चाहे कोई करोड़ों उपाय कर के सींचे,...