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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-13

जय श्री राधे कृष्ण ……. निसिचर एक सिंधु महुँ रहई, करि माया नभु के खग गहई, जीव जन्तु जे गगन उड़ाहीं, जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं…..!! भावार्थ:- समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाश में उड़ते हुए...

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किस्मत को कभी दोष दें, अपनी किस्मत आप खुद बनाते हैं।

किस्मत को कभी दोष दें, अपनी किस्मत आप खुद बनाते हैं। मोटीवेशनल स्पीकर विजय बत्रा ने कहा कि मेरे पास स्विच ऑन करने की टेक्नीक है, जिसे आप सबसे शेयर करना चाहता हूं। हमारे भीतर असीम ऊर्जा है, जो कई...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-12

जय श्री राधे कृष्ण ……. राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान, आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान…..!! भावार्थ:- तुम श्री रामचंद्र जी का सब कार्य करोगे क्योंकि तुम बल -बुद्धि के भंडार हो। यह आशीर्वाद देकर वह...

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माँ का आँचल

"मां का आँचल" "हे भगवान! दो महीने के लिए मुझे सहनशक्ति देना, रात - दिन की रोका टोकी और जली कटी सुनने की हिम्मत देना"… पति हिमांशु के साथ गांव से आई अपनी रौबीली सास और ससुर को देखकर निशा...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-11

जय श्री राधे कृष्ण ……. बदन पइठि पुनि बाहेर आवा, मागा बिदा ताहि सिरु नावा, मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा, बुधि बल मरमु तोर मैं पावा…!! भावार्थ:- और वे उसके मुख में घुसकर (तुरंत) फिर बाहर निकल आए और उसे...

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भगवान कहाँ हैं ? कौन हैं ? किसने देखा है ?

भगवान कहाँ हैं ? कौन हैं ? किसने देखा है ? . मैं कईं दिनों से बेरोजगार था, एक एक रूपये की कीमत जैसे करोड़ो लग रही थी, इस उठापटक में था कि कहीं नौकरी लग जाए।  आज एक इंटरव्यू...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-10

जय श्री राधे कृष्ण ……. जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा, तासु दून कपि रूप देखावा, सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा, अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा…..!! भावार्थ:- जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान जी उसका दूना रूप दिखलाते थे...

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ईर्ष्या

ईर्ष्या बहुत पहले की बात है, एक गांव में एक गरीब किसान रहता था। उसके पास एक बहुत छोटा सा खेत था जिसमें कुछ सब्जियां उगा कर वह अपना व अपने परिवार का पेट पालता था। गरीबी के कारण उसके...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-9

जय श्री राधे कृष्ण ……. जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा,/कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा, सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ, तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ….!! भावार्थ:- उसने योजन भर (चार कोस में) मुंह फैलाया । तब हनुमान जी ने अपने शरीर को...

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