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वाल्मीकि रामायण  भाग 21

वाल्मीकि रामायण  भाग 21 अगले दिन प्रातःकाल महाराज दशरथ के सेवक उन्हें जगाने आए। सूत, मागध, वन्दीजन और गायक उन्हें जगाने के लिए मधुर स्वर में गायन करने लगे। उनका गायन सुनकर आस-पास के वृक्षों पर बैठे पक्षी तथा राजमहल...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-306

जय श्री राधे कृष्ण ….. "ममता रत सन ग्यान कहानी, अति लोभी सन बिरति बखानी, क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा, ऊसर बीज बएँ फल जथा ।। भावार्थ:- ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का...

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वाल्मीकि रामायण  भाग 20

वाल्मीकि रामायण  भाग 20 प्रातःकाल श्रीराम ने लक्ष्मण को जगाकर कहा, “भाई! मीठी बोली बोलने वाले जंगली पक्षियों का कलरव सुनो। अब हमारे प्रस्थान के योग्य समय आ गया है।” फिर यमुना के शीतल जल में स्नान करके वे तीनों...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-305

जय श्री राधे कृष्ण ….. "लछिमन बान सरासन आनू, सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू, सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती, सहज कृपन सन सुंदर नीती ।। भावार्थ:- हे लक्ष्मण ! धनुष - बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ...

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वाल्मीकि रामायण  भाग 19

वाल्मीकि रामायण  भाग 19 वत्सदेश (प्रयाग) के वन में प्रवेश करने पर उन दोनों भाइयों ने भूख लगने पर कन्द-मूल आदि लेकर एक वृक्ष के नीचे ठहरने के लिए चले गए। वहाँ बैठने पर श्रीराम ने अपने भाई से कहा,...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-304

जय श्री राधे कृष्ण ….. "बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ।। भावार्थ:- इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता । तब श्री राम...

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वाल्मीकि रामायण  भाग 18

वाल्मीकि रामायण  भाग 18 श्रीराम के पीछे-पीछे जो अयोध्यावासी तमसा नदी के तट तक आ गए थे, वे अगली सुबह जागने पर श्रीराम को वहाँ न पाकर अत्यंत व्याकुल हो गए। उन्होंने आस-पास बहुत खोजा, किन्तु उन्हें श्रीराम, लक्ष्मण, सीता...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-303

जय श्री राधे कृष्ण ….. "रिषि अगस्ति कीं साप भवानी, राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी, बंदि राम पद बारहिं बारा, मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ।। भावार्थ:- (शिव जी कहते हैं) हे भवानी ! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त...

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वाल्मीकि रामायण  भाग 17

वाल्मीकि रामायण  भाग 17 दशरथ जी की आज्ञानुसार तुरंत ही जाकर सुमन्त्र जी उत्तम घोड़ों से जुता हुआ एक स्वर्णाभूषित रथ ले आए। तब श्रीराम ने हाथ जोड़कर अपनी माता कौसल्या से कहा, “माँ! तुम पिताजी को देखकर यह न...

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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-302

जय श्री राधे कृष्ण ….. "नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ, कृपासिंधु रघुनायक जहाँ, करि प्रनामु निज कथा सुनाई, राम कृपा आपनि गति पाई ।। भावार्थ:- वह भी (विभीषण की भाँति) चरणों में सिर नवा कर वहीं चला, जहाँ कृपा...

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