खूबसूरत झाँसे, जो ज़िंदगी सँवार गए
दिनभर का थका-हारा अविनाश रात का खाना खाकर अभी अपने कमरे में जाकर लेटा ही था कि पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला उसका बेटा मनु कॉपी लेकर उसके पास आ गया।
“पापा… आपने मुहावरे पढ़े हैं?”
अविनाश ने थकान के बावजूद मुस्कुराकर कहा, “हाँ बेटा, बिल्कुल पढ़े हैं। क्यों?”
मनु ने कॉपी खोलते हुए पूछा, “पापा, ‘झाँसे में आना’ का क्या मतलब होता है?”
अविनाश हँस पड़ा। “बहुत आसान है बेटा… झाँसे में आना यानी धोखे में आ जाना।”
मनु ने मासूमियत से अगला सवाल किया, “पापा, आप कभी किसी के झाँसे में आए हैं?”
यह सुनते ही अविनाश की नजर दीवार पर टंगी अपने माता-पिता की तस्वीर पर टिक गई। कुछ पल वह तस्वीर को देखता रहा, फिर धीमे से बोला—“हाँ बेटा… बहुत बार आया हूँ।”
उसकी आँखों के सामने बचपन के दृश्य तैरने लगे। जब वह दूध पीने में आनाकानी करता था, तो माँ प्यार से कहतीं—“मेरा राजा बेटा है ना… अगर एक घूँट में दूध खत्म कर देगा, तो जल्दी बड़ा होकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”
माँ की इस बात के झाँसे में आकर वह न जाने कितने गिलास दूध पी गया था।
बाबा भी कहाँ पीछे रहते थे। सुबह उसे दौड़ाते हुए कहते—“बस थोड़ी दूर और… फिर रुक जाना।” अविनाश थककर गुस्सा होता, लेकिन बाबा मुस्कुराते रहते।
एक दिन वही दौड़ स्कूल की प्रतियोगिता में काम आई। अविनाश प्रथम आया तो उसे समझ आया कि बाबा का वह झाँसा भी कितना खूबसूरत था। लेकिन जिंदगी ने जल्द ही एक ऐसा झाँसा दिया, जिसका दर्द आज तक उसके सीने में था।
एक दिन स्कूल से लौटकर उसने देखा कि बाबा सफेद कपड़ों में आँगन में शांत लेटे थे। लोग उन्हें उठाकर कहीं ले जाने लगे।वह रोते हुए पूछता रहा—“बाबा को कहाँ ले जा रहे हो?”
काकी ने उसे बहलाते हुए कहा—“अस्पताल ले जा रहे हैं बेटा… थोड़ी देर में वापस आ जाएँगे।”
लेकिन बाबा फिर कभी वापस नहीं आए।कुछ ही दिनों बाद माँ भी उसे छोड़कर चली गईं। अविनाश का पढ़ाई से मन उठ गया। वह किताबें छोड़कर घंटों चुप बैठा रहता।
तब उसकी ताई ने उसका हाथ पकड़कर कहा—“अवि, अगर तू पढ़ेगा नहीं तो अपनी माँ को भगवान के घर से वापस कैसे लाएगा?”
माँ को वापस लाने की मासूम चाहत में वह ताई के उस झाँसे में आ गया।
उसने आठवीं पास की… फिर दसवीं… फिर बारहवीं। लेकिन एक दिन उसे सच्चाई समझ आ गई—माँ-बाबा अब कभी वापस नहीं आएँगे।
फिर भी उसने पढ़ाई नहीं छोड़ी।
वर्षों की मेहनत के बाद एक दिन वह डॉक्टर बन गया। डिग्री हाथ में लेकर जब वह माता-पिता की तस्वीर के सामने खड़ा हुआ तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
ताई की बात याद आई—“जब तू लोगों का इलाज करेगा, तेरे माँ-बाबा की आत्मा जरूर तृप्त होगी।”
उस दिन अविनाश को समझ आया कि बचपन में माता-पिता ने जो-जो सपने दिखाए थे, वे झाँसे नहीं थे… वे तो बच्चे को आगे बढ़ाने के खूबसूरत बहाने थे।
कभी बड़ा होकर घोड़ा-गाड़ी दिलाने का वादा, कभी लाल किला घुमाने का सपना… और कभी दूध के एक गिलास के बदले बड़ा आदमी बनने का सपना।
“पापा… आप किसके झाँसे में आए थे?”
मनु ने उसका हाथ हिलाकर पूछा।
अविनाश की सोच टूट गई। उसने मुस्कुराकर मनु को सीने से लगा लिया। “बेटा… मैं तुम्हारी दादी के सबसे खूबसूरत झाँसे में आया था।”
मनु ने पूछा, “वो कैसे?”
अविनाश ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा—“उन्होंने मुझे इतना प्यार दिया कि मुझे जिंदगी भर यह झाँसा बना रहा कि मेरे माता-पिता कहीं गए नहीं हैं… वे मेरी हर सफलता में मेरे साथ हैं।”
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
मनु ने पिता को कसकर पकड़ लिया। और अविनाश ने मन ही मन कहा—“हर झाँसा धोखा नहीं होता… कुछ झाँसे जिंदगी जीने की वजह बन जाते हैं।”
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जय श्रीराम
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