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रिश्तों की स्टेपनी

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रिश्तों की स्टेपनी

पहले बीएमडब्ल्यू कार में स्टेफनी नहीं होती थी। आज तो मैं आपसे रिश्तों की स्टेपनी की बात करने जा रहा हूं। कल ही मुझे पता चला कि मेरी एक परिचित, जो दिल्ली में अकेली रहती हैं, उनकी तबियत ख़राब है। मैं उनसे मिलने उनके घर गया।

वो कमरे में अकेली बिस्तर पर पड़ी थीं। घर में एक नौकरानी थी, जो आराम से ड्राइंग रूम में टीवी देख रही थी। मैंने दरवाजे की घंटी बजाई, तो नौकरानी ने दरवाज़ा खोला और बड़े अनमने ढंग से उसने मेरा स्वागत किया। ऐसा लगा जैसे मैंने नौकरानी के आराम में खलल डाल दी हो।

मैं परिचित के कमरे में गया, तो वो लेटी थीं, काफी कमज़ोर और टूटी हुई सी नज़र आ रही थीं। मुझे देख कर उन्होंने उठ कर बैठने की कोशिश कीं। मैंने सहारा देकर उन्हें बिस्तर पर बिठाया। मेरी परिचित चुपचाप मेरी ओर देखती रहीं, फिर मैंने पूछा कि क्या हुआ?

परिचित मेरे इतना पूछने पर बिलख पड़ीं। कहने लगीं, “बेटा अब ज़िंदगी में अकेलापन बहुत सताता है। कोई मुझसे मिलने भी नहीं आता।” इतना कह कर वो रोने लगीं। कहने लगीं, “ बेटा, मौत भी नहीं आती। अकेले पड़े-पड़े थक गई हूं। पूरी ज़िंदगी व्यर्थ लगने लगी है।”

मुझे याद आ रहा था कि इनके पति एक ऊंचे सरकारी अधिकारी थे। जब तक वो रहे, इनकी ज़िंदगी की गाड़ी बीएमडब्लू के रन फ्लैट टायर पर पूरे रफ्तार से दौड़ती रही। इन्होंने कई मकानों, दुकानों, शेयरों में निवेश किया, लेकिन रिश्तों में नहीं किया। तब इन्हें लगता था कि ज़िंदगी मकान, दुकान और शेयर से चल जाएगी। इन्होंने घर आने वाले रिश्तेदारों को बड़ी हिकारत भरी निगाहों से देखा। इन्हें यकीन था कि ज़िंदगी की डिक्की में रिश्तों की स्टेपनी की ज़रूरत नहीं। एक बेटा था और तमाम बड़े लोगों के बेटों की तरह वो भी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ता हुआ अमेरिका चला गया। एक दिन पति संसार से चले गए, मेरी परिचित अकेली रह गईं।

ज्यादा विस्तार में क्या जाऊं, इतना ही बता दूं कि ये यहां पिछले कई वर्षों से अकेली रहती हैं। क्योंकि इन्होंने अपने घर में रिश्तों की स्टेपनी की जगह ही नहीं रखी थी, तो इनसे मिलने भी कोई नहीं आता। अब गाड़ी है, तो पंचर तो हो ही सकती है। तो एक दिन इन्होंने नौकरानी रूपी डोनट स्टेपनी देखभाल के लिए रख ली।

कल जब मैं अपनी परिचित के घर गया, तो रिश्तों की वो डोनट स्टेपनी ड्राइंग रूम में टीवी देख रही थी। मेरी परिचित अपने कमरे में बिस्तर पर कुछ ऐसे लेटी पड़ी थीं जैसे मथुरा में अपनी गाड़ी के पंचर हो जाने के बाद जब तक कंपनी से कोई गाड़ी उठाने नहीं आया, मैं पड़ा था।

गाड़ी सस्ती हो या महंगी उसमें अतिरिक्त टायर का होना ज़रुरी है। स्टेपनी के बिना कितनी भी बड़ी और महंगी गाड़ी हो, पंचर हो गई, तो किसी काम की नहीं रहती।

ज़िंदगी में चाहे सब कुछ हो, अगर आपके पास सुख-दुख के लिए रिश्ते नहीं, तो आपने जितनी भी हसीन ज़िंदगी गुजारी हो, एक दिन वो व्यर्थ नज़र आने लगेगी। उठिए, आज ही अपनी गाड़ी की डिक्की में झांकिए कि वहां स्टेपनी है या नहीं। है तो उसमें हवा ठीक है या कम हो गई है। उठिए और आज ही अपनी ज़िंदगी की डिक्की में भी झांकिए कि उसमें रिश्तों की स्टेपनी है या नहीं। है तो उसमें मुहब्बत बची है या कम हो गई है।

ध्यान रहे, डोनट टायर के भरोसे कार कुछ किलोमीटर की ही दूरी कर पाती है, पूरा सफर तय करने के लिए तो पूरे पहिए की ही ज़रूरत होती है।

पुन:-अमेरिका और यूरोप में सड़कें अच्छी हैं, तो वहां शायद रन फ्लैट टायर वाली गाड़ियां साथ निभा भी जाती हैं। वहां सरकार आम आदमी को सामाजिक सुरक्षा देती है, तो आदमी तन्हा भी किसी तरह जी लेता है। लेकिन हमारे यहां न सड़कें अच्छी हैं, न कोई सामाजिक सुरक्षा है। ऐसे में हमें गाड़ी के पीछे पूरा टायर भी चाहिए और ज़िंदगी के पीछे पूरे रिश्ते भी। जो चूका, समझिए वो चूक ही गया।

संबंध कभी भी सबसे जीतकर नहीं निभाए जा सकते ,संबंधों की खुशहाली के लिए झुकना होता है, सहना होता है, दूसरों को जिताना होता है और स्वयं हारना होता है।

सच्चे सम्बन्ध ही वास्तविक पूँजी है..!!

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जय श्रीराम

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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